स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, ताम्रपत्र धारी पिताश्री विश्वनाथ नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के मुखार विंद से जो कुछ उनके बारे में सुना या पढा
बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री एवं आधुनिक बिहार के निर्माता ' बिहार केसरी ‘डा0 श्री कृष्ण सिंह’ की आज भी जरूरत है।
मैंने तो कभी डाक्टर श्री कृष्ण सिंह जी को न देखा और न मिला । मगर अपने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, ताम्रपत्र धारी पिताश्री विश्वनाथ नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के मुखार विंद से जो कुछ उनके बारे में सुना या पढा वही हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। आज उन्हें यादकर बिहार ही नही अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र के सभी बर्ग-समुदाय के बुद्धिजीवियों एवं उनसे प्रभावित जनों का सिर गर्व से गौरवान्वित Shri Krishna Sinha - Wikipediaऔर उंचा हो जाता है। क्योंकि वे स्वार्थ की राजनीति कभी नही की । जाति-धर्म से उपर उठकर राष्ट्र की सेवा किया जिस के कारण उन्हे महामानव की संज्ञासे विभूषित किया गया ,तो यह कोई अतिशयोक्ति नही। 'उंच-नीच का भेद न माने, वही श्रेष्ठ जन ज्ञानी है । दया - धर्म जिसमें हो वही सबसे पूज्य प्राणी है।।'
क्योंकि यह व्यक्ति कभी भी अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने सिद्धान्तों से समझौता नही किया । अपने कर्तव्यों और वसुलो के पक्के हिमायती श्री कृष्ण बाबू अपने विकास के कार्यों और विचारों से लोगों के 'नाक के बाल बने थे '। लोगों पर उनकाऔर उन पर लोंगो का इतना विश्वास बना था कि चुनावों में अपनी पाटी के नेताओं के साथ अपने लिए कभी भी वे वोट मांगने या चुनाव प्रचार करने नहीं जाना पड्ता था। ऐसा कहा जाता है कि उन्हे विश्वास था कि ' वे जनता का काम करते हैं तो लोग उसकी मजदूरी बोट के रूप मेें जरूर देंगे।' आज याद आ रहे हैं इनके राजनीतिक मित्र और वैशाली, गोरौल के लाल,स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी बिहार विधान सभा के प्रथम स्पीकर स्मृति शेष विन्देश्वरी प्रसाद वर्मा, जो लगातार 16 वर्षों तक बिहार विधान सभा के स्पीकर रहे। इन दोनो का बिहार के विकास में अतुलनीय,अद्वितीय और अविस्मरणीय योगदान रहा । मगर आजादी के इतने दिनो बाद भी ऐसे विभूतियोंको याद करने के लिए समय नही? वैशाली में इन दोनो की प्रतिमा लगाने का असफल, प्रयास जारी है ।
क्या प्रथम मुख्य मंत्री और प्रथम स्पीकर होने के नाते वह सम्मान या चर्चा नही हुआ, जो होना चाहिए था। बिहार के विकास में इन लोगों ने अपनी महती भूमिका निभाते हुए, जाति-धर्म से ऊपर उठ कर बिहार की गौरव- गरिमा प्रदान करने, ऊपर उठाने में क्या कोई कसर छोड़ा ? नही तो फिर जिसने देश की आजादी के लिए इतनी वही लडाई लडी, अपने परिवार, किसी जात,समाज के लिए तो नही लडा ? फिर तो दुख इसी बात से होती है कि ऐसे स्वतंत्रता-संग्राम के सेनानियों, युगपुरूषों को जो सागर - स्वरूप के स्वभाव का स्वामी रहा है उनकी जयन्ती उसकी पुण्यतिथि मनाने के लिए जात,समाज उसके परिवार के लोंगो को सामने आने की जरूरत क्यों पड़ती है ?
वोट की राजनीति के कू प्रभाव के कारण इन राष्ट्रीय छवि वाले महा मानवों को जो स्वयं मेें सागर था उन्हे जाति-धर्म और समाज के लोग इन्हे लोटा मेें भरने का कूप्रयास कर इनकी राष्ट्रीय छवि को धूमिल करने का षड़यंत्र कर उनके विराट और विशाल रूप को बौना बनाने का दुस -प्रयास क्यों करते है? क्या ये लोग जात-समाज -धर्म के लिए अपनी जवानी की कुर्वानी दी थी? या देश और राष्ट्र के नव निर्माण के लिए? देश की आजादी के लिए लडने बाले को सभी का आदर मिलना चाहिए, सभी की श्रद्धांजलि, पुष्पांजलि मिलनी चाहिए। उनका आदर , सम्मन और सत्कार करने का मतलब आप भारत माता को प्यार कर रहे हैं, आदर दे रहे है, सत्कार कर रहे है। आज हम भारतीय निर्वल आत्माओं के पास हैं ही क्या जो दें, बस आपके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि आपके सपनो का बिहार बनाए । इस भारत रूपी उपवन मेें सभी पुष्पों को मुस्काने का अधिकार है , सबको खिलने का मौका मिलना चाहिए। अगर उनके बताए रास्ते पर हम चलें और अपने प्रति निधियों को भी चलने को प्रेरित करें तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और पुष्पांजलि होगी। हम अपने शब्द सुमनो से बने माला चढाकर अपनी विनम्र श्रद्धा निवेदित करता हूं
शत-शत नमन,कोटि- कोटि प्रणाम। जय बिहार, जय भारत देश महान ।
स्वतंत्रता सेनानियों आओ,तुम बार-बार इस धरती पर आओ और हमारा नेतृत्व कर नया बिहार और नया भारत ही नही अपितु अब अखण्ड आर्यावर्त बनाओ तो फिर से स्वागत और अभिवंदन है। " हार जो इस देश का तूने किया उपकार । कौन कर सकता है तेरे मूल्य को निराधार ?"
श्री हनुमान जी के ध्वज का ध्वजारोहण के साथ "श्री भगवान परशुराम ज्ञान महायज्ञ" की शुरुआत
06 मार्च 2020 को प्राण-प्रतिष्ठा के साथ आम लोगों के लिए श्री भगवान परशुराम मंदिर, कुतुबपुर डुमरी, हाजीपुर, वैशाली में खोल दिया गया था। उसके महज़ सप्ताह बाद ही कोविड के नाम पर देश को बंदी का मार झेलना पड़ा था और श्री भगवान परशुराम मंदिर से लोगों का जुड़ाव मानसिक रूप से रह गया था। लेकिन 2021 के प्रथम वर्ष पर आयोजित अक्षय तृतीया पुजा पर लोगों में एक मजबूती दिखी और समाज में कोविड के बावजूद उत्साह था।
निरंतर प्रयास और ऊर्जा का परिणाम यह रहा कि मंदिर परिवार और मजबूती की ओर बढ़ा और समाजिक एकता के साथ मिलकर एक वैचारिक मजबूती मिले इसके लिए हर वर्ष अक्षय तृतीया पर भव्य आयोजन का दौर जारी हो गया। जिसका परिणाम है कि दो साल पहले लिया गया निर्णय और विचार 2026 में सफ़लता की ओर बढ़ गया है।
आप सभी को यह जानना चाहिए कि श्री भगवान परशुराम मंदिर, कुतुबपुर डुमरी, हाजीपुर, वैशाली में 19-28 अप्रैल 2026 को शुरू होने वाले "श्री भगवान परशुराम ज्ञान महायज्ञ" के लिए 06 फरवरी की सुबह 8 बजे श्री भगवान हनुमत ध्वज का ध्वजारोहण विधि-विधान और पूजा-पाठ के साथ किया गया।
श्री भगवान हनुमान जी का आह्वान कर पताका बजरंगबली से युक्त का ध्वजारोहण किया गया और बजरंगबली से विनती कि गईं कि यज्ञ अब आपके हवाले और आपके नेतृत्व में "श्री भगवान परशुराम ज्ञान महायज्ञ" संपन्न किया जाएगा।
"श्री भगवान परशुराम ज्ञान महायज्ञ" की अध्यक्षता न्यास के अध्यक्ष मनीष कुमार सिंह के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। वहीं मुख्य यज्ञ के विद्वान पंडित चंद्र प्रकाश त्रिपाठी सहित अन्य 4 पंडितों द्वारा सभी विधि - विधान पूर्वक ध्वजारोहण कराया गया। साथ ही सुबह की विधिवत पूजा व आरती महंत पंडित हरिकांत शर्मा द्वारा श्री भगवान परशुराम जी का संपन्न किया गया।
वहीं ध्वजारोहण की जिम्मेवारी पशुपतिनाथ चौधरी व उनकी पत्नी सीमा देवी ने विधिवत पूजा अर्चना के साथ विद्वान पंडितों के सान्निध्य में पूरा किया।
अध्यक्ष मनीष कुमार सिंह ने बताया कि "श्री भगवान परशुराम ज्ञान महायज्ञ" भारतीय संस्कृति को और अधिक प्रभावी ढंग से समझने का माध्यम बनकर होगा। श्री भगवान परशुराम जी का तीरभुक्ति (तिरहुत) से गहरा नाता रहा है, वहीं पंचपुरमधाम क्षेत्रों में आगमन से करोड़ों वर्षों बाद श्री भगवान परशुराम मंदिर के रूप में भगवान का आगमन उनके आशीर्वाद का परिणाम है। यज्ञ में ऐतिहासिक व्यक्तियों और विद्वानों का आगमन और विचारों को सुनने और आत्मसात् करने का अवसर मिलेगा।
श्री हनुमत ध्वज के ध्वजारोहण कार्यक्रम का हिस्सा बने महत्वपूर्ण लोगों में प्रो. प्रेम सागर सिन्हा, अधिवक्ता पंकज कुमार और अमित कुमार, उपेंद्र चौधरी, दिग्विजय चौधरी, राम नरेश चौधरी, अरविंद कुमार, नागेन्द्र शर्मा, राकेश कुमार सिंह, संजीव कुमार, राजीव कुमार, सुशील कुमार, अजय तिवारी उर्फ मुखिया जी, रूपेश कुमार, रंजीत कुमार, राहुल कुमार, अलख कुमार, विवेक चौधरी, राकेश कुमार, अरव कुमार 5 साल का छोटा सा बच्चा खुब उत्साह से सहयोग में लगा रहा।
वहीं पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय सोनपुर के नए प्राचार्य प्रोफेसर विनय कुमार सिंह ने अपना पदभार ग्रहण किया। जिसके लिए डाॅ. भूषण सिंह ने शुभकामनाएं दी।
कई देशों में शिक्षा प्रदान कर अपनी विद्वता से समाज को मजबूती प्रदान करने वाले डॉक्टर भूषण सिंह 31 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त हो गए। डॉ. भूषण सिंह के लिए महाविद्यालय परिवार ने एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय परिसर में अगले दिन 01 फरवरी 2026 को किया गया। डॉ. भूषण सिंह के दृढ़तापूर्वक चिंतन के साथ पुराने भवन से नय भवन का सफ़र संघर्ष का रहते हुए भी आदर्शपूर्ण रहा है। 26 जनवरी 2026 की तैयारियों से लेकर लंबे समय से शिक्षकों / प्रोफेसरों के हक के मानदेय देकर भी हर एक का विश्वास जीता।
महाविद्यालय परिवार की ओर से प्रोफेसर जितेन्द्र शुक्ला ने बताया कि पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय सोनपुर में कई उतार चढ़ाव हुआ और बहुत मजबूती के साथ डाॅ. भूषण सिंह ने महाविद्यालय के हितों पर मजबूत क़दम उठाए। जब बड़े भाई तुल्य डॉ. भूषण सिंह को महाविद्यालय परिवार से सेवानिवृत्ति के लिए उपस्थित हुए तो मन भर गया। व्यक्तिगत रिश्तों में और महाविद्यालय के परिसर का साथ हमेशा मजबूती प्रदान करती हैं।
आपको बता दें कि पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय सोनपुर के नए परिसर मे निवर्तमान प्राचार्य डॉ भूषण सिंह के सेवानिवृत होने के उपलक्ष्य मे एक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें स्थानीय विधायक डॉक्टर विनय कुमार सिंह, गंगा सिंह कॉलेज के प्राचार्य सह महाविद्यालय के सचिव डॉक्टर परमेन्द्र रंजन सिंह समेत सैकड़ों गणमान्य लोग उपस्थित हुए।
वहीं पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय सोनपुर के नए प्राचार्य प्रोफेसर विनय कुमार सिंह ने अपना पदभार ग्रहण किया। जिसके लिए डाॅ. भूषण सिंह ने शुभकामनाएं दी।
इस समारोह को संबोधित करते हुए विधायक महोदय ने वचन दिया कि इस महाविद्यालय के बुरे दिन अब ख़त्म हुए नया सवेरा हुआ है। हर संभव सहायता कर इसके खोई गरिमा को वापस लायेंगे। समारोह को सम्बोधित करते हुए सचिव महोदय ने कहा कि जो जैसा करेगा वैसा पायेगा। एक साल में इस महाविद्यालय को अपनी खोई प्रतिष्ठा को वापस लौटाया जायेगा।
समारोह का संचालन डॉक्टर भूपेश प्रसाद मिश्र भूपेश ने किया । इस समारोह के आयोजन प्रो जितेंद्र कुमार शुक्ल, प्रो रामनाथ राय, प्रो अशोक कुमार राय, प्रो मनोज राय, प्रो संगीता कुमारी, प्रो पल्लवी कुमारी की भूमिका सराहनीय रही।
बैकुंठ शुक्ल पुस्तकालय का उद्घाटन श्री भगवान परशुराम मंदिर परिसर हुआ
अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल जी के जीवन दर्शन को लेकर उनके शिक्षक जीवन के साथ स्वतंत्रता सेनानी के रूप में फांसी के फंदे पर देश के लिए झूल गए। उन्हीं अमर शहीद बैकुंठ शुक्ल जी के नाम पर श्री भगवान परशुराम मंदिर कुतुबपुर डुमरी हाजीपुर वैशाली में श्री भगवान परशुराम तीर्थ पंचपुरमधाम न्यास के द्वारा "बैकुंठ शुक्ल पुस्तकालय" का विधिवत उद्घाटन किया गया।
बैकुंठ शुक्ल जी एक शिक्षक थे और अपने चाचा योगेन्द्र शुक्ल जी से प्रेरित होकर स्वतंत्रता समर का हिस्सा बने। जब वक्त आया कि अमर शहीद भगत सिंह की हत्या का बदला लेना था और जिसके गवाही के कारण भगत सिंह को फांसी हुई थी उसकी हत्या करनी है तो लाॅटरी के माध्यम से चयन किया गया था। उसी लाॅटरी के माध्यम से बैकुंठ शुक्ल जी का नाम आया और उन्होंने अपराधी का अंत किया और बाद में फांसी के फंदे पर झूल गए।
स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान करना हमारा दायित्व है और धीरे-धीरे आगे सभी वैशाली जिले के स्वतंत्रता सेनानीयों के नाम पर विभिन्न प्रकार के संस्थानों की स्थापना के साथ विभिन्न जगहों पर नामांकरण का भी काम किया जाएगा। यह जानकारी देते हुए अध्यक्ष, श्री भगवान परशुराम तीर्थ पंचपुरमधाम न्यास कुतुबपुर डुमरी हाजीपुर वैशाली ने पूरी जानकारी दी।
उद्धाटनकर्ता डाॅक्टर सर्वेश्वर कुमार जिनके हाथों 12 अक्टूबर 2024 को शिलान्यास किया गया था आज उन्हीं के हाथों आज लोगों के लिए खोल दिया गया। उद्घाटन करते हुए डॉ. सर्वेश्वर कुमार ने कहा कि श्री भगवान परशुराम मंदिर कुतुबपुर डुमरी हाजीपुर वैशाली में लगातार यह प्रयास हैं कि एक मजबूत आधार के साथ समाज के लिए आवश्यक क़दम उठाए जाएं। आप सभी का सामुहिक सहयोग और विश्वास से न्यास के अध्यक्ष मनीष कुमार सिंह जी को व्यक्तिगत रूप से मजबूत करता है और धीरे-धीरे आगे बढ़ते जा रहे हैं इसके लिए हम सबों को मिलकर साथ देना हैं।
अध्यक्ष मनीष कुमार सिंह ने बताया कि लगभग 2500 पुस्तक विभिन्न लोगों से प्राप्त किया गया है। वहीं श्री भगवान परशुराम तीर्थ पंचपुरमधाम न्यास के अध्यक्ष के रूप में मेरी अध्यक्षता में आज का कार्यक्रम पूर्ण किया गया। हमारे अहम् सहयोगियों में उपाध्यक्ष दिग्विजय चौधरी, महंत हरिकांत चौधरी, प्रोफेसर प्रेम सागर सिन्हा, अधिवक्ता पंकज कुमार व अमित कुमार, मुकेश कुमार नाती स्वतंत्रता सेनानी बसावन सिंह, न्यास के सदस्य सुशील कुमार, इंद्रजीत शुक्ला पैक्स अध्यक्ष जलालपुर लालगंज, उपेन्द्र चौधरी, पशुपतिनाथ चौधरी, श्रीराम कुमार शर्मा, सुशील कुमार, राजीव कुमार, राजकुमार शर्मा, देवानंद शर्मा आदि मौजूद रहे।
वहीं अध्यक्ष श्री भगवान परशुराम तीर्थ पंचपुरमधाम न्यास ने कहा कि मुझसे सीधा संपर्क करने के लिए व्हाट्स ऐप पर चैनल सर्च करें "श्री भगवान परशुराम तीर्थ पंचपुरमधाम" वहीं यूट्यूब पर भी आप देख सकते हैं।
साथ ही बेवसाइट पर भी ध्यान दें सकते हैं जल्दी ही बेवसाइट को सुलभ बना लिया जाएगा। बड़ी सुचनाओं के साथ जल्दी ही मिलता हूं।
आरएसएस के अस्तित्व को ही चुनौती दे रहा संघ का पूर्व प्रचारक ! क्या करेगा संघ ?
आस्तीन में सांप पालना, बैलगाड़ी के नीचे चलकर गाड़ी खींचने का भरम पालना या और जो कहावत या किस्से जो भी याद आती हो याद कर लिया जाय कुछ ऐसी ही हालत कर दी है गुजराती लाॅबी अपने आप को एक राजनीतिक दल का भरम पाले एक दुनिया के सबसे बड़े अंपजीकृत संगठन की। लगता तो यही है कि यह सीधी चेतावनी है उस अंपजीकृत संगठन के मुखिया को अगर अभी नहीं समझे तो वजूद खत्म कर दिया जायेगा या उस संगठन का मुखिया भी गुजराती लाॅबी अपनी मरजी के मुताबिक जिसे चाहेगी बनाकर बैठा देगी कोई कुछ नहीं कर पायेगा। जैसे अपने राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बिना किसी से रायशुमारी किये एक जमूरे को बैठा दिया गया है। ऐसा करके दिल्ली ने नागपुर को खुली चुनौती दे दी है। सवाल है अब नागपुर क्या करेगा ? नागपुर में दिल्ली की शिकायतों की पोटली खुल रही है। तो क्या शिकायतों की पोटली के आसरे राजनीतिक तौर पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ती हुई दिल्ली की अहंकारी जोड़ी को नागपुर कोई चुनौती दे पायेगा या कहें नकेल कस पायेगा ? नागपुर में जो शिकायतों की पोटली खुल रही है उसके पीछे न तो किसी राज्य के मुख्यमंत्री को लेकर शिकायत है न ही किसी को राज्यपाल बनाने या बदलने की सोच है, न ही किसी को मंत्री बनाने या मंत्री पद से हटाने की मांग है दरअसल जो कुछ है वह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर है। और अध्यक्ष का मतलब बहुत साफ है। राजनीतिक तौर पर अध्यक्ष संगठन में और खास तौर पर चुनाव के वक्त जो चाहता है वही होता है। लेकिन 2014 के बाद बीजेपी की जो राजनीतिक लकीर बदली उसमें जो दिल्ली की सत्ता ने सोचा वही हुआ सत्ता और संगठन के तौर पर। अमित शाह और जेपी नड्डा का अध्यक्ष होना तो ठीक ठाक था लेकिन जिस तरह से पार्टी लाइन को धत्ता बताते हुए गुजराती जोड़ी ने अध्यक्ष को स्थापित कर दिया उससे न केवल बीजेपी के वरिष्ठ और कद्दावर नेताओं को चौंका दिया बल्कि आरएसएस को भी सकते में ला दिया है। पितृ संगठन आरएसएस को लोकसभा, विधानसभा चुनावों का वास्ता देकर गुजराती जोड़ी अध्यक्ष के चुनाव को टालती रही है और संघ भी इसी मुगालते में रहा आया कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव तो उससे गुफ्तगू किये बगैर होगा नहीं। अध्यक्ष को लेकर कभी शिवराज सिंह चौहान तो कभी वसुंधरा राजे सिंधिया तो कभी योगी आदित्यनाथ के साथ संजय जोशी का नाम चर्चाओं में तैरता रहा लेकिन गुजराती जोड़ी ने सबको चौंकाते हुए नितिन नवीन को ठीक उसी तरीके से अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठा दिया जैसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में पर्ची मुख्यमंत्रियों को बैठा दिया गया था। और इस सबका एक ही मतलब निकलता है कि गुजराती जोड़ी चाहती है कि दिल्ली ही सत्ता का एकमात्र केन्द्र बने सब कुछ यहीं से चले। वैसे देखा जाए तो मोदी - शाह की जोड़ी ने जेपी नड्डा के जरिए संघ को बहुत पहले ही साफ संकेत दे दिया था यह कहलाते हुए कि अब बीजेपी अपने फैसले लेने के लिए समक्ष हो गई है अब उसे आरएसएस रूपी बैसाखी की कोई जरूरत नहीं है। गुजराती जोड़ी द्वारा दिये गये झटकों से संघ हिचकोले खाने लगा है !
दिसम्बर 2025 चलाचली की बेला में है। मार्च - अप्रैल 2026 में देश के भीतर 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। बतौर बड़ा राज्य असम ही है जहां पर बीजेपी की मौजूदगी है। पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने के लिए बीजेपी संघ की मदद से एक लंबे अरसे से प्रयासरत है। बीजेपी ने जिन राजनीतिक मुद्दों को हवा दी उन मुद्दों की डोर पकड़ कर संघ स्वयंसेवकों ने भी मैदान में कूदकर निशाने पर ममता बनर्जी को लिया। साम्प्रदायिकता की एक लकीर खींची गई। सीएए एवं एनआरसी को लेकर भी सवाल खड़े हुए। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में शाइनिंग इंडिया के नारे के जरिए प्रमोद महाजन ने जो राजनीतिक बिछात बिछाई थी उसमें शाइनिंग इंडिया की चमक और उसके भीतर का अंधियारा दोनों को ही संघ अनमने भाव से देख रहा था यानी उसे अच्छा नहीं लग रहा था। स्वयंसेवक बाहर नहीं निकला और बीजेपी चुनाव हार गई। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में ही यह मैसेज निकलकर आया था कि किसी भी दूसरे राजनीतिक दल को बीजेपी के साथ खड़ा नहीं होना चाहिए। तभी तो कुछ सवाल जहन में थे नितीश कुमार और बाला साहब ठाकरे के। 2014 के चुनाव परिणामों ने भी खुला मैसेज दिया कि अगर बहुमत के साथ खड़े राजनीतिक दल के साथ आप गलबहियाँ डालते हैं तो आपका कैडर, आपका संगठन खत्म हो जायेगा। संघ परिवार के साथ में छोटे व्यापारियों का जुड़ाव है। वह गुरू दक्षिणा के रूप में संघ को आर्थिक सहयोग भी देता है लेकिन संघ के राजनीतिक संगठन का जुड़ाव छोटे व्यापारियों के साथ न होकर बड़े - बड़े कार्पोरेट्स, पूंजीपतियों के साथ है। यानी कार्पोरेट्स और पूंजीपतियों पर संघ की नहीं सत्ता की पकड़ है। और जिसके हाथ में सत्ता है उसने अपने मुताबिक अध्यक्ष चुन लिया। बीजेपी के भीतर वरिष्ठ और कद्दावर नेताओं की एक लंबी कतार है, जिसमें पूर्व अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं, और ये सभी इस वक्त आरएसएस का दरवाजा खटखटाते हुए कह रहे हैं कि कुछ तो निर्णय कीजिए। यह निर्णय लेने की घड़ी है अन्यथा सब कुछ हाथ से निकल जाएगा।
फिलहाल तो संघ के भीतर पसरा सन्नाटा यही कह रहा है कि राजनीतिक पहचान मोदी - शाह की है। राजनीतिक निर्णय लेने की क्षमता भी मोदी - शाह में ही है। कार्पोरेट्स की पूंजी पाॅलिटिकल इकोनॉमी की तर्ज पर फंडिंग के जरिए बीजेपी के पास कैसे और किस रूप में आयेगी यह भी मोदी - शाह ही तय करते हैं। अब तो बात बढ़ते - बढ़ते यहां तक आ गई है कि जब हम ही सब कुछ तय करते हैं तो अब बीजेपी भी हम ही चलायेंगे। बीजेपी को चलाने के लिए अब अध्यक्ष भी हमारा ही होगा। तो क्या दिल्ली की बढ़ती हुई उम्र बीजेपी और संघ परिवार की उम्र को घटा रही है। उम्र के इस पड़ाव में दिल्ली की सत्ता कुछ भी गवांना नहीं चाहती है, सब कुछ पा लेना चाहती है। शायद इसीलिए सारे संवैधानिक संस्थानों यहां तक कि इलेक्शन कमीशन और देश की सबसे बड़ी अदालत को भी अपने अनुकूल कर लिया गया है। इसका आरोप विपक्ष खुल्लमखुल्ला लगा भी रहा है। सवाल यह है कि तीन महीने के बाद 5 राज्यों में होने वाले चुनाव के पहले संघ क्या कोई निर्णय लेगा ? बीजेपी के भीतर उन नेताओं के सामने एक कठिन घड़ी है जहां पर उनकी अपनी राजनीतिक उम्र अब बीजेपी के नये अध्यक्ष नितिन नवीन के आने के बाद खत्म हो जायेगी ? अगर सारे निर्णय, सारे चेहरे, सारी पहचान एक ही शख्स के ईर्द गिर्द है तो फिर इतनी बड़ी पार्टी और सांगठनिक ढ़ाचे (बीजेपी) के मायने क्या हैं ?
सरसंघचालक मोहन भागवत इस हकीकत से वाकिफ हैं कि नैरेटिव मायने रखता है तभी तो वह स्वयंसेवकों से कह रहे हैं कि नैरेटिव की दिशा में मत दौड़िए नैरेटिव के आसरे चीज़े बदल जाती हैं। लेकिन अगर राजनीति नैरेटिव के आसरे ही चलती है तो फिर संघ उसमें कैसे हिस्सेदारी नहीं रखेगा। बंगाल का चुनाव दिल्ली सत्ता की सांसे फुला रहा है। उसे पता है कि अगर बंगाल में उसका राजनीतिक प्रयोग सफल नहीं हुआ तो फिर भूल जाइए कि देश के भीतर विपक्ष की राजनीति को धराशाई कर भी पायेंगे। आर्थिक नीतियों के आसरे छत्रपों पर कसी गई नकेल और अब मनरेगा के बाद जी राम जी के जरिए राज्यों के ऊपर जो बड़ा बोझ 40 फीसदी का डाला गया है उसमें मुश्किल होगी। इसलिए बंगाल में कोई चेहरा नहीं होने के बाद भी मोदी - शाह को चुनाव तो हरहाल में, हर कीमत पर जीतना ही होगा (चुनाव आयोग का सहारा) । जीतना तो हरहाल में ममता बनर्जी को भी होगा। 2014 के बाद से सारे नैरेटिव दिल्ली से बने जिसमें राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है। संघ स्वयंसेवकों ने बीजेपी को उसकी कल्पना से ज्यादा 1.5 करोड़ पिछले चुनाव में वोट दिलवा दिये। यानी ममता बनर्जी और बीजेपी के बीच सिर्फ 60 लाख वोटों का अंतर है। जहां ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को 2 करोड़ 90 लाख वोट मिले थे वहीं बीजेपी को 2 करोड़ 30 लाख वोट मिले थे। अभी तक तो यही खबर मिल रही है कि एसआईआर के जरिए लगभग 48 लाख वोटर गायब कर दिये गये हैं। गुजराती जोड़ी ने पार्टी के वरिष्ठ-कद्दावर नेताओं और आरएसएस को नजरअंदाज करते हुए बीजेपी का अध्यक्ष तो स्थापित कर लिया है लेकिन बंगाल चुनाव को लेकर चिंतित नजर आ रही है क्योंकि उसे पता है कि अगर संघ के स्वयंसेवक जमीन पर नहीं उतरे तो वह बंगाल में कितनी भी मशक्कत खुद और चुनाव आयोग के आसरे कर ले वह अपने पुराने वोटरों को भी खो देगी। बंगाल के भीतर बहुत बड़ी संख्या में छोटा व्यापारी संघ से जुड़ा हुआ है जिसने बीजेपी को वोट किया था। वह इस दौर में दिल्ली की नीतियों के कारण संकट में है। देश की आर्थिक परिस्थितियां एकतरफा हो चली है। सत्ता कार्पोरेट्स और पूंजीपतियों के साथ कदमताल कर रही है। छोटी इंडस्ट्री चलाने वाले गायब होते चले जा रहे हैं।
असम में तो सिर्फ 6 लाख वोटों का अंतर है। यहां पर बीजेपी को लगभग 63 लाख 84 हज़ार तथा कांग्रेस को लगभग 57 लाख 3 हज़ार वोट मिले थे। 6 लाख वोटों की खाई को पाटने के लिए कांग्रेस कितनी मशक्कत करेगी यह बात अलहदा है लेकिन संघ एक झटके में बीजेपी को असम में झटका दे सकता है। यानी यहां भी बीजेपी को अपनी नैया पार लगाने के लिए संघ की जरूरत है। तमिलनाडु में वैसे तो सीधी फाइट एआईडीएमके और डीएमके के बीच में है लेकिन बीजेपी अपने तौर पर चाहती है कि उसे यहां कांग्रेस से ज्यादा वोट मिल जायें। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 19 लाख 76 हज़ार तो बीजेपी को 12 लाख 13 हजार के करीब वोट मिले थे। यानी बीजेपी को 7 लाख वोट कम मिले थे कांग्रेस की तुलना में। डीएमके को 1 करोड़ 74 लाख तथा एआईडीएमके को 1 करोड़ 53 लाख वोट मिले थे। पुडुचेरी में भी कांग्रेस और बीजेपी के बीच नम्बर एक की लड़ाई है लेकिन यहां पर गठबंधन के साथी मायने रखते हैं। यहां पर भी कांग्रेस और भाजपा के बीच बहुत बारीक अंतर है। आरएसएस की जितनी (70 हज़ार से अधिक) शाखाएं देशभर में लगती हैं उसमें सबसे ज्यादा संख्या केरल में लगने वाली शाखाओं की है लेकिन उसे केरल में वोट सबसे कम मिलते हैं। केरल में तो सीधा मुकाबला एलडीएफ और यूडीएफ के बीच में है और दोनों जानते हैं कि इस बार यूडीएफ का पलड़ा भारी है। पिछली बार एलडीएफ को 1 करोड़ 5 लाख तथा यूडीएफ को 82 लाख 83 हज़ार के आसपास वोट मिले थे। यानी वोटों का अंतर 23 लाख के आसपास था। इसका सीधा सा अर्थ है कि बीजेपी की मौजूदगी दक्षिण भारत में ऊंट के मुंह में जीरे की माफिक है।
तीन महीने बाद होने वाले पांच राज्यों के चुनाव को लेकर दिल्ली की धड़कनें असंतुलित हो रही है क्योंकि उसने पार्टी अध्यक्ष चयन में संघ को नजरअंदाज तो कर दिया है लेकिन वह यह भी जानती है कि अगर संघ का स्वयंसेवक मशक्कत करने के लिए जमीन पर नहीं उतरा तो उसका राजनीतिक भविष्य तो दांव पर लग जायेगा। क्योंकि उसने कार्पोरेट्स और पूंजीपतियों के साथ खड़े होकर जिस तरह से छोटे कामगारों के रास्ते में कांटे बो कर जख्म दिये हैं उन्हें अगर कोई सहला सकता है तो वह सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक। लेकिन दूसरा सच यह भी है कि दिल्ली की सत्ता संघ को डरा भी रही है कि अगर हम चुनाव हारे तो आप जेल में होंगे ! आप जेल से मतलब है कि जिस तरीके से राहुल गांधी संघ को लेकर व्यक्तव्य देते रहते हैं, खुले तौर पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भरी आवाजें कांग्रेस के भीतर से निकलती रहती हैं वो दरअसल आरएसएस को कहीं ना कहीं सत्ता के करीब लाकर खड़ा कर देती है। संघ के स्वयंसेवकों की वह कतार जो कहीं न कहीं सावरकर के साथ जुड़ी है और गुरू गोलवलकर की सोच से प्रभावित है उसके मन में एक ही सवाल है ना तो हिन्दुत्व बचेगा और ना ही संगठन बचेगा तो आप क्या कर लोगे ? तो फिर रास्ता तो निकालना होगा। सत्ता को अपनी मनमर्जी से हांकने के लिए चुनावी परिणाम ही मायने रखेंगे।
इतना तो साफ - साफ दिखाई दे रहा है कि बीजेपी एक नई टीम तैयार कर रही है लेकिन बीजेपी का मतलब इस बार संघ परिवार नहीं है। बीजेपी का मतलब सम्पूर्ण बीजेपी भी नहीं है। यह दिल्ली की सत्ता को टिकाये रखने की ऐसी मशक्कत है जिसमें वह जो निर्णय लेंगे, जिस पर ऊंगली रखेंगे, जिससे टेलिफ़ोन पर बात कर लेंगे, जिसके कांधे पर हाथ रख देंगे वही सब कुछ हो जायेगा। क्या यह सारे मैसेज नागपुर को मंजूर हैं ? जो नजर आ रहा है दरअसल वह उजियारा नहीं है। जो नजर नहीं आ रहा है उसके भीतर एक संघर्ष है, उसके भीतर एक चुनौती है। यानी टकराव तो होना है लेकिन टकराव की मियाद तीन महीने की है जब परिणाम भी सामने आ जायेंगे। उस परिणाम से पहले सही मायने में समय सिर्फ 30 दिनों का ही है। जिसमें यह साफ हो जायेगा कि "बहुत हो चुका या फिर यही होगा जिसे जो करना है कर ले"। यानी राजनीतिक तौर पर विपक्ष से नहीं दिल्ली की सत्ता की लड़ाई अब अपने भीतर से है, अपने साथ खड़े हुए लोगों से है, अलग सोच रखने वाले नेताओं से है, कार्यकर्ताओं से है, स्वयंसेवकों से है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 100 बरस की यात्रा में आकर ऐसे अंतर्द्वंद्व में फंसा हुआ दिखाई दे रहा जहां वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह 100 के बाद भटक गया है या फिर भटका हुआ संघ अब अपने लिए नये रास्ते तलाशना चाह रहा है। जबकि हकीकत यह है कि राजनीतिक तौर पर मौजूदा सरकार उसके प्रचारक द्वारा चलाई जा रही है जिसने उसको वैचारिक तौर पर संकट में लाकर खड़ा कर दिया है। जबसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना यानी 1925 उस पूरे सफर में यानी हेडगेवार, गुरू गोलवलकर, देवरस, रज्जू भैया, कुप्स सुदर्शन तक किसी ने भी संघ को वैचारिक तौर पर चुनौती दी नहीं है। अब जब संघ की बागडोर मोहन भागवत के हाथ में है तो उसे सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक तौर पर ही मिल रही है। अपनी वैचारिक विरासत को बचाये और बनाये रखने के लिए अंतिम रास्ता एक ही है महात्मा गांधी की विचारधारा से टकराना मगर आरएसएस में इतनी कूबत नहीं है कि वह अपनी वैचारिक परिस्थितियों के जरिए महात्मा गांधी की विचारधारा को खारिज कर दे। तो इसके लिए उसे राजनीतिक सत्ता अपने प्रचारक की चाहिए लेकिन उस सत्ता को लेकर भी अंतर्विरोध है इसीलिए मोहन भागवत ने कोलकाता में खुलकर कहा कि जो कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। यह नारा अपने आप में कोई मायने नहीं रखता है, इससे काम चलने वाला नहीं है। आपने देश के लिए क्या किया है यह बताना और समझाना होगा। यह नारा देश में राजनीतिक तौर पर बीजेपी ने मंडल - कमंडल की लड़ाई में आत्मसात किया था। आजादी की लड़ाई और देश को मिली आजादी में महात्मा गांधी के चरखे को खारिज करते हुए मोहन भागवत यह कह रहे हैं चरखा के जरिए स्वराज नहीं मिलता है। दरअसल चरखा तो जिंदगी जीने के तौर तरीके और देश के साथ जुड़ने का तरीका हो सकता है लेकिन इसके जरिए स्वराज की कल्पना मत कीजिए। तो क्या 100 बरस की अपनी यात्रा के बाद संघ अपनी राजनीतिक जमीन को खो चुका है और उसे दुबारा पाने का प्रयास कर रहा है या फिर अपने ही प्रचारक की सत्ता से नाराज है। इसके साथ ही प्रचारक की सत्ता से मदद भी मांग रहा है क्योंकि इस दौर में नेहरू-गांधी परिवार की राजनीति जिस रास्ते पर चल रही है उसमें अधिकतर कांग्रेस ही सत्ता में रही है। बीजेपी तो पहली बार सत्ता में है यानी स्वयंसेवक सत्ता में है यानी प्रचारक सत्ता में है और उसे चुनौती दे रहा है नेहरू-गांधी परिवार की विरासत और लेगेसी को संभालने वाला शख्स। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघ और बीजेपी को वैचारिक तौर पर नग्न करने में लगा हुआ है। संघ और बीजेपी के सामने सवाल है कि उसका सामना कैसे किया जाए ? शायद इसीलिए संघ सरसंघचालक मोहन भागवत कोलकाता में राजनीति की चासनी में लिपटे हुए भाषण में राजनीतिक लकीर को और मोटा करते हुए खुले तौर पर देश में महात्मा गांधी की धारा और विचारधारा को खारिज करते हुए हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इसके नीचे कोई ठोस जमीन नहीं है सिवाय प्रचारक की सत्ता के। नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के दौर में प्रतिबंधित होने के बाद भी आरएसएस के सामने ऐसी परिस्थिति नहीं आई थी । किसी भी सरसंघचालक ने यह कहने और बताने की जरूरत नहीं समझी कि संघ को उसके राजनीतिक संगठन के चश्मे से ना देखा जाए। हेडगेवार, गोलवलकर, देवरस, रज्जू भैया, कुप्स सुदर्शन तक ने यह कहने की कोशिश नहीं की कि संविधान में चाहे परिवर्तन हो जाय, उसके भीतर हिन्दू राष्ट्र डाला जाय या ना डाला जाय इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम तो सिर्फ और सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के तौर पर खुद को मानते हैं, देखते हैं और देश को भी इसी तर्ज पर देखते हैं। लेकिन आज के सरसंघचालक मोहन भागवत ऐसा कहने से चूक नहीं रहे हैं। वे आरएसएस की 100 बरस की यात्रा को सेलीब्रेट करने के लिए देशभर में घूम रहे हैं। इसी कड़ी में वे कोलकाता में शुध्द राजनीतिक भाषा में भाषण देते हुए कह रहे हैं कि अगर हिन्दू समाज एकजुट हो जाए तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो जायेगा। जबकि इसके पहले आरएसएस एक सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन के तौर पर बिसात जरूर बिछाता रहा है । चाहे वह नेहरू का दौर रहा हो या इंदिरा गांधी का या फिर जब संघ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के पीछे जाकर खड़ा हो गया था लेकिन ऐसा कहने की जुर्रत किसी भी सरसंघचालक ने नहीं की थी। आखिर मौजूदा वक्त में ऐसी कौन सी परिस्थिति आ गई कि संघ प्रमुख को यह कहना पड़ रहा है कि संघ को बीजेपी के ऐनक से मत देखिए जबकि सत्ता की लगाम तो उसका अपना ही प्रचारक थामे हुए है। तो क्या यह नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को सम्हाले राहुल गांधी जिस तरह से इस दौर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरएसएस को लेकर सवाल उठा रहे हैं या फिर संघ की वैचारिक परिस्थितियां इस दौर में इतनी नाजुक हो चली है कि उसे अपने ही प्रचारक से दूर हटकर संघ को समझने और समझाने की कोशिश शहर दर शहर घूमकर सरसंघचालक को ही करनी पड़ रही है। हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना मूलतः हिन्दू महासभा के नेता सावरकर की है। उस दौर में जब सावरकर अपना भाषण खत्म करते थे तो संघ के लोग वहां पहुंच कर जाती हुई भीड़ को रोककर उनके बीच हिन्दू समाज को लेकर अपने विचारों को रखते थे क्योंकि उस समय संघ के पास सावरकर जैसा एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो सावरकर की तर्ज पर अपने विचार व्यक्त कर सके। फिर भी मोहन भागवत के पहले किसी भी सरसंघचालक ने हिन्दू समाज को एकजुट करने के पीछे हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना खुले तौर पर नहीं की थी। लेकिन मोहन भागवत संघ के 100 बरस पूरे होने पर संघ को जिस दिशा में ले जा रहे हैं उसमें उनके सामने पहली चुनौती तो खुद संघ से निकले प्रचारक और स्वयंसेवकों की वह टीम है जो इस समय देश को चला रही है और देश को चलाते वक्त प्रचारक जिन नीतियों के आसरे देश को चलाना चाहता है उससे संघ वैचारिक तौर पर दूर हो चला है। शायद इसीलिए संघ को कहना पड़ रहा है कि संगठन हमारा रहेगा, लेकिन बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा, संगठन कौन कैसे सम्हालेगा इसको लेकर भी टकराव है। क्योंकि इस दौर में बीजेपी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की उस बिसात का हिस्सा है जिसमें बहुत सारे स्वयंसेवक जो बीजेपी में शामिल हैं, मंत्री हैं, मंत्री रह चुके हैं वह फिट बैठ नहीं रहे हैं। लेकिन जब सरसंघचालक यह कहते हैं कि संघ को बीजेपी के चश्मे से नहीं संघ में शामिल होकर समझने की कोशिश कीजिए तो यह एक तरह से वह उस संकट से अपना बचाव कर रहे हैं जो मौजूदा वक्त में राहुल गांधी बीजेपी की राजनीतिक सत्ता को चुनौती दे रहे हैं और उसके पीछे वैचारिक और विचारधारा के तौर पर आरएसएस हर जगह पर नजर आता है तो क्या पहली बार आरएसएस खुद को बीजेपी से अलग कर रहा है।
संविधान को लेकर भी देश के भीतर व्यापक बहस शुरू हो गई है। उससे भी सरसंघचालक ने खुद को मोदी सरकार से अलग कर लिया है क्योंकि वह जान गये हैं कि देश के भीतर संविधान को लेकर राजनीतिक तौर पर विपक्ष जिस तरीके से लोगों के बीच में संवाद बना रहा है उसमें वह सिर्फ बाबा साहब अंबेडकर नहीं बल्कि देश के भीतर व्यापक वोट बैंक जो पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के जरिए राजनीति को अगर साधने लग जाए और एक तरफ बीजेपी और संघ खड़ी नजर आयेगी तो एक झटके में मोदी तो ध्वस्त होंगे ही संघ भी ध्वस्त हो जायेगा। शायद इसीलिए पहली बार मोहन भागवत ने संविधान को लेकर चल रहे मौजूदा विवाद से खुद को यह कहते हुए अलग - थलग कर लिया कि संविधान में हिन्दू राष्ट्र जोड़ने का फैसला संसद करती है या नहीं करती है और अगर करती भी है तो हमें इससे कुछ मतलब नहीं है। वह करें या ना करें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि हम खुद को यानी हमारा राष्ट्र एक हिन्दू राष्ट्र है। हम हिन्दू हैं। यही सच हम मानते हैं। जबकि बीजेपी इस बात का जिक्र नहीं करती है। वह तो काॅस्टिटयूशन के जरिए परिवर्तन कर सकती है क्योंकि काॅस्टिटयूशन की शपथ लेकर ही सरकार बनी हुई है यानी संविधान को लेकर विपक्ष और मोदी सरकार के बीच के टकराव में संघ कहीं अलग नजर आना चाहिए। यानी सरसंघचालक देश के विपक्ष को ही खारिज करते हुए कुछ इस तरह का मैसेज दे रहे हैं कि सत्ता भी हम ही हैं और विपक्ष भी हम ही हैं। शतायु संघ को लेकर किसी ने कभी ऐसा सोचा ही नहीं कि संघ को इस पड़ाव पर आकर जनता के बीच जाकर अपनी विचारधारा को लेकर सफाई देनी पड़ेगी। इससे तो यही लग रहा है कि संघ राहुल गांधी के निशाने से बचने के लिए बीजेपी से दरकिनार हो रहा है। देश के भीतर तो किसी ने नहीं कहा कि संघ किसी पर हमला करने की योजना बना रहा है। तो फिर सरसंघचालक यह सफाई क्यों दे रहे हैं कि संघ का मकसद केवल हिन्दू समाज को संगठित करना है। यह किसी के खिलाफ नहीं है। हम तो योगा की तर्ज पर स्वयंसेवकों को फिट रखने का काम करते हैं। कोलकाता में भागवत एक तरफ बंगाल की राजनीतिक सत्ता को पलटने के लिए हिन्दूओं को एकजुट होने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दूओं के लिए सरकार से कुछ करने की गुजारिश कर रहे हैं। क्या बीजेपी या कहें संघ प्रचारक मोदी की नीतियां बतौर सत्ता संघ की विचारधारा से टकराकर संघ के लिए ही मुश्किल पैदा कर रही है ? नेहरू और इंदिरा के दौर में संघ पर प्रतिबंध लगा, राजीव गांधी के दौर में मंड़ल - कमंड़ल की राजनीति का उफान खुलकर सामने आया, अटलबिहारी बाजपेई के दौर में गुजरात का राजनीतिक प्रयोग निकलकर आया जो मौजूदा वक्त में उत्तर प्रदेश में शिप्ट हो गया है। राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर सरसंघचालक खुद अपनी बातों से फंसते चले जाते हैं। राहुल गांधी का कहना है कि संघ संविधान को नहीं मानता है, वह ताकत को सत्य से ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है । सरसंघचालक मोहन भागवत कह रहे हैं कि संविधान में हिन्दू राष्ट्र जोड़ें या ना जोड़ें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम तो हिन्दू राष्ट्र की भावना से ही खुद को हिन्दू मानते हैं और यही सच है। यानी सरसंघचालक मोहन भागवत संविधान से संघ को अलग कर रहे हैं। सरसंघचालक मोहन भागवत ताकत को ही सब कुछ मानते हैं सत्य को नहीं मानते हैं और ताकत का मतलब मौजूदा वक्त में मोदी सत्ता है। वह सत्ता अगर डिग जायेगी तो सब कुछ दिगंबर हो जायेगा। इसीलिए तो वह उसी ताकत का इस्तेमाल हिन्दू समुदाय की एकजुटता के आसरे बंगाल में सत्ता परिवर्तन भी देखना चाहते हैं। देश के भीतर संवैधानिक परिस्थितियों की जो सेकुलर लकीर है संघ उस लकीर से हटकर हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू परिकल्पना और हिन्दुत्व के आसरे देश के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय और जातियों को लेकर भी आरएसएस की सोच हटकर रही है। सवाल उठता है कि क्या अपने ही अंतर्विरोध में फंसे हुए शतायु संघ के सामने पहली बार अपने ही अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है ? और उस अस्तित्व की लड़ाई में पहली बार वह अपने प्रचारक के प्रधानमंत्री बनने के जज्ब से हटकर वैचारिक और सियासी तौर पर खुद को अलग भी कर रहा है और मदद करने की गुहार भी लगा रहा है। अपने जीवन की 100 वीं सीढ़ी पर खड़े होकर संघ अपने स्वयंसेवकों को एकजुट करने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा वक्त में सारे धागे गुथम्मगुथ्था हैं क्योंकि स्वदेशी गायब है नारे को छोड़ कर, लोकल फार वोकल है लेकिन प्रोडक्शन खत्म हो चला है। असमानता चरम पर है और सत्ता कार्पोरेट के साथ खड़ी है। देश के भीतर आरएसएस के जो स्वयंसेवक सामान्य लोगों के साथ जीवन जीते थे आज के दौर में उससे हटकर सत्तानुकूल सुविधाभोगी हो चले हैं। राजनीतिक सत्ता की ताकत से जुड़ने का रास्ता आरएसएस से होकर ही निकलता है तो ऐसे में सत्ता के प्रतिबिंब के तौर पर संघ की मौजूदगी जो खुद को हेडगेवार और गोलवलकर के दौर की वैचारिक परिस्थितियों के साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है वह कैसे सही होगा ? वह तो खोखला ही होगा। तो क्या जो काम जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी नहीं कर पाये वह काम क्या राहुल गांधी कर देंगे ?
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के नूरपुर गांव में हुआ
चौधरी चरण सिंह (1902‑1987) भारतीय राजनीति के उन गिने‑चुने नेताओं में से एक हैं, जिनकी पहचान हमेशा “किसानों के मसीहा” के रूप में रही है। उनका जीवन संघर्ष, सामाजिक जागरूकता और कृषि‑नीति में गहरी समझ का समुच्चय है। भारत में उनके योगदान अविस्मरणीय है।
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के नूरपुर गांव में हुआ। उनका परिवार एक साधारण जाट किसान परिवार था। पिता, चौधरी मुख्तार सिंह, एक छोटे‑से‑जमींदार थे और उन्होंने अपने बेटे को शिक्षा के महत्व को समझाया। बचपन से ही चरण सिंह को खेत‑खलिहान की वास्तविक समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी सोच में किसान‑केन्द्रित दृष्टिकोण विकसित हुआ।
प्राथमिक शिक्षा नूरपुर में ही पूरी करने के बाद, चरण सिंह ने हापुड़ के सरकारी स्कूल से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इंटरमीडिएट की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की और फिर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। न्होंने कृषि अर्थशास्त्र और ग्रामीण विकास के सिद्धांतों को गहराई से अध्ययन किया, जो बाद में उनकी नीति‑निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाए।
1920 के दशक में भारत में असहयोग आंदोलन का दौर था। चरण सिंह ने महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। 1930 में उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लिया और कई बार जेल गए। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता की हस्तांतरण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्वाधीनता का भी नाम है। इस कारण उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को संगठित करने का काम शुरू किया।
1937 में चरण सिंह ने “किसान सभा” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य किसानों को संगठित कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारना था। उन्होंने जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और “भूमि‑से‑भूख” की नीति को चुनौती दी। इस दौरान उन्होंने कई बार किसानों के हित में आंदोलन किए, जिनमें “बंदोबस्ती आंदोलन” और “किसान मोर्चा” प्रमुख हैं।
1940 के दशक में चरण सिंह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। उन्होंने 1946 के प्रांतीय चुनावों में भाग लिया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद, उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में कार्य किया, जिसमें कृषि, पशुपालन और ग्रामीण विकास मंत्रालय शामिल थे।
1967 में चरण सिंह को भारत के कृषि मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। इस अवधि में उन्होंने “हरित क्रांति” के प्रारंभिक चरण को तेज किया। उन्होंने उच्च उपज वाले बीज, उन्नत सिंचाई तकनीक और रियायती उर्वरक वितरण को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि कृषि का आधुनिकीकरण ही ग्रामीण गरीबी को मिटाने का एकमात्र रास्ता है।
1979 में जनता पार्टी की सरकार में चरण सिंह ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। उनका कार्यकाल केवल सात महीने तक चला, परन्तु इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये। उन्होंने “किसान ऋण माफी योजना” शुरू की, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को राहत मिली। साथ ही उन्होंने “अनाज भंडारण नीति” को सुदृढ़ किया, जिससे अन्न की बर्बादी कम हुई।
चरण सिंह ने हमेशा जमींदारी प्रथा को समाप्त कर भूमि का पुनर्वितरण करने की बात कही। उन्होंने “भू‑सुधार” को अपनी प्राथमिकता बनाया और इस दिशा में कई विधेयक पारित करवाए। उनका मानना था कि जब तक ज़मींदारों के पास बड़ी ज़मीनी संपत्ति होगी, तब तक किसान स्वतंत्र नहीं हो पाएगा।
सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देना चरण सिंह की प्रमुख नीति थी। उन्होंने “किसान सहकारी बैंक” और “सहकारी कृषि समितियों” की स्थापना में मदद की। इन संस्थानों ने किसानों को कम ब्याज पर ऋण, बीज, उर्वरक और तकनीकी सहायता प्रदान की।
उन्होंने “जल संरक्षण” को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया। उन्होंने “ड्रिलिंग टैंक” और “छोटे जलाशयों” के निर्माण को प्रोत्साहित किया, जिससे सूखे‑प्रवण क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ी।
चरण सिंह ने महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए भी काम किया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए स्कूलों की स्थापना को प्रोत्साहित किया और “बालिका शिक्षा” को प्राथमिकता दी। साथ ही उन्होंने “अस्पृश्यता” के खिलाफ आवाज उठाई और दलित वर्ग के उत्थान के लिए कई योजनाएं बनाईं।
चरण सिंह को “सादगी का प्रतीक” कहा जाता है। वह हमेशा साधारण कपड़े पहनते थे और अपने घर में साधारण भोजन करते थे। उनका व्यवहार विनम्र, परन्तु दृढ़ था। वह अपने सिद्धांतों पर अटल रहे और कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए समझौता नहीं किया। उनका भाषण सरल और प्रभावी होता था, जिससे वह ग्रामीण जनता के बीच आसानी से जुड़ पाते थे।
चौधरी चरण सिंह की नीतियों का प्रभाव आज भी भारतीय कृषि में देखा जा सकता है। “हरित क्रांति” के बाद भारत ने अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की, जिसमें उनकी भूमिका को अक्सर अनदेखा किया जाता है। उनके द्वारा स्थापित सहकारी मॉडल आज भी कई राज्यों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है।
किसानों के हित में उनका “कर्ज माफी” और “भू‑सुधार” आज भी चर्चा का विषय हैं। उनके जन्मदिन, 23 दिसंबर, को “किसान दिवस” के रूप में मनाया जाता है, जिससे उनकी किसान‑हितैषी विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जा रहा है।
चौधरी चरण सिंह सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधारक, कृषि विशेषज्ञ और ग्रामीण विकास के प्रणेता थे। उनका जीवन संघर्ष, सिद्धांत और कार्य आज भी भारतीय लोकतंत्र में एक प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की सेवा होना चाहिए, विशेषकर उन किसानों की, जो देश की रीढ़ हैं। उनका आदर्श “किसानों की खुशी में ही राष्ट्र की खुशी है” आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।
जब भारत की आधी से ज्यादा आबादी रात दो बजे निद्रा में लीन होगा तभी भारत के एक चौथाई से भी कम हाई प्रोफाइल लोगों की नींदे उड़ी हुई अमेरिका में खुल रही एक फाइल को टकटकी लगाये देख रही होगी कि कहीं उसमें उनका नाम तो नहीं है और उन लोगों में खासतौर पर राजनीतिक सत्ता, राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोग और बड़ बड़े कार्पोरेट्स की जमात होगी। ऐसा नहीं है कि इस खुलती फाइल से भारत भर के भीतर खलबली है बल्कि पूरी दुनिया के नामचीनों की धड़कनें बढ़ी हुई है। दुनिया भर के देशों के साथ ही भारत में भी इस बात को लेकर चर्चा चल रही है कि क्या भारत के भीतर राजनीतिक भूचाल तो नहीं आ जायेगा सुबह होते - होते। भारत की राजनीतिक सत्ता और कार्पोरेट्स या फिर अपने - अपने तरीके से दुनिया में अपनी पहचान बना चुके नेताओं और कार्पोरेट हाउसेज की फेहरिस्त भी उसी लकीर पर तो नहीं खड़े हैं जहां पर दुनिया के जाने-माने शख्सियतों की कतार इस वक्त खड़ी नजर आ रही है ? बताया जा रहा है कि इस फाइल में एक लाख से ज्यादा पन्ने हैं जिसमें बैंक रिकार्ड भी है और लगभग 95 हजार तस्वीरें (अश्लील) हैं। मामला सिर्फ और सिर्फ यौन शोषण से नहीं जुड़ा हुआ है बल्कि यह सब चलता कैसे है? दुनिया की ताकत कैसे खुद को इसके पीछे छिपा लेती है? इसका गठजोड़ अपने तरीके से एक माफिया की तर्ज पर तो नहीं है ? यह सवाल अमेरिका से लेकर दुनिया के नामचीन शख्सियतों को लेकर है। लोकतांत्रिक देशों में तो इसे नैतिकता बोध के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है। इस फाइल से जिन्न के आसरे निकलने वाले तथ्यों को यह मानकर चला जा रहा है कि इसमें न तो सब कुछ झूठ होगा न ही सब कुछ सच होगा क्योंकि इस कुछ सच के दायरे में हवाई यात्राओं के रिकॉर्ड और फारेंसिक रिपोर्ट भी हैं। एप्सिन की 2019 में हुई मौत के बाद खुलने वाली फाइल में वे सारे दस्तावेज होने की बात कही जा रही है कि जिसमें किस तरह से दुनिया के तमाम देशों में किस तरीके से सत्ता और सियासत चलती थी वे सब सामने आ जायेंगे। अब तक क्या क्या छिपाया गया जिसमें लोगों के नाम और उनकी तस्वीरें शामिल है सब उजागर हो जायेगा क्योंकि अमेरिकी अदालत ने 18 दिसम्बर 2025 के बाद इसे उजागर करने का आदेश दिया है। अमेरिकी अदालत ने अपने आदेश में बहुत साफतौर पर कहा है कि किसी भी डाक्यूमेंट्स को इसलिए नहीं छिपा सकते हैं कि उससे किसी को शर्मिंदगी होगी, किसी की छबि खराब होगी। वह राजनीतिक तौर पर संवेदनशील है। शायद इसीलिए दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों की नजर इस फाइल के खुलने पर लगी हुई है। इसमें उन लोगों के नामों का खुलासा होगा जो सैक्स रैकट चलाने वाले से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जूड़े हुए थे। शायद इसी को लेकर भारत के भीतर कार्पोरेट हाउसेज और राजनीतिक सत्ता की बैचेनी बढ़ी हुई दिख रही है। तो क्या यह भारत की राजनीतिक सत्ता की संवेदनशीलता को प्रभावित करेगी? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि जेफरी एप्स्टिन अपने जीवनकाल में एक समय दुनिया के ज्यादातर ताकतवर नेताओं का चहेता रहा है। उसके अपने प्राइवेट जहाज और आइलैंड थे जहां पर वह सीक्रेट पार्टियां आयोजित करवाता था। इन जगहों पर वह आने वाले हाई प्रोफाइल लोगों को अय्याशी के लिए कम उम्र के लड़के और लड़कियों को मुहैया करवाता था। पार्टीज में केवल सैक्स भर नहीं होता था यहां पर राजनीतिक फंडिंग भी होती थी जिसके आसरे अलग अलग देशों में अलग अलग तरीके से राजनीति को प्रभावित करने का खेल खेला जाता था। सत्ता को बनाने - बिगाड़ने के लिए आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय तौर पर बिसात बिछाई जाती थी। सवाल तो यह भी उठाया जा रहा है कि क्या इस स्कैंडल के पीछे इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद का भी हाथ है? एक कहानी तो यह भी चल रही है कि जेफरी एप्स्टिन और उसकी गर्लफ्रेंड गिसन मैक्सवेल ने जासूसी के मकसद से दुनिया की बड़ी बड़ी हस्तियों और नेताओं को हनीट्रैप करते थे और हनीट्रैप के बाद ब्लैकमेल की परिस्थितियों को पैदा कर राजनीतिक सत्ता को डिगाने, बनाने के लिए पार्टिकल्स फंडिंग के लिए चौसर बिछाई जाती थी जिसमें दुनिया के बड़े बड़े बैंकों की भी भागीदारी होती थी। इसीलिए खुलने वाली फाइल पनामा स्विस पेपर की तर्ज पर नहीं है ना ही यह स्विस बैंक के कुछ डाक्यूमेंट है। ड्राॅप साइट बेबसाइट में बहुत साफ तौर पर लिखा है कि 2013 से 2015 के बीच इजराइली सीक्रेट एजेंट योनो कोरन ने तीन बार एप्स्टिन के मैनहटन वाले अपार्टमेंट में 1015 दिन बिताये थे। एप्स्टिन के ईमेल रिकार्ड वाले डाक्यूमेंट के भीतर साफ तौर पर पता चलता है कि योनो कोरन - एप्स्टिन और इजराइल सरकार एक दूसरे से कम्युनिकेट थे और पूर्व इजराइली प्रधानमंत्री एहूद बराक और एप्स्टिन के बीच कई ईमेल का आदान प्रदान था जिसमें पैसों के लेनदेन का जिक्र है।
भारत के भीतर 2013 से 2015 के बीच जो राजनीतिक परिस्थितियां डामाडोल हुई थी। क्या इजराइल और मोसाद की भागीदारी जो बेबसाइट के जरिए नजर आती है वह भारत की राजनीतिक सत्ता को प्रभावित करती है क्या ? पूरी फाइल खुलने के पहले ही दुनिया भर के तमाम राष्ट्राध्यक्षों खासतौर पर जो सत्ता में है, तमाम कार्पोरेट्स और बड़े बड़े बिजनेसमैनों की सांसे इसलिए फूली हुई हैं क्योंकि अभी तक जिन हाई प्रोफाइल लोगों के नाम सामने आये हैं उनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिलक्लिंटन, प्रिंस एंड्रूज जैसे दिग्गज शामिल हैं। अभी तक एप्स्टिन के आईलैंड में तफरी करने वाले नामचीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व राष्ट्रपति बिलक्लिंटन, पूर्व फाइनेंस सेक्रेटरी लेरी समर्स, सांइंस्टिस्ट स्टीफन हैकिंग, प्रोफेसर नमचोस्की, अमेरिकी खरबपति ईलाॅन मस्क, पाप स्टार माइकल जैक्सन, सिंगर काॅटिनालव, माॅडल नओमी कैमबल, काॅमेडियन क्रिसटकर, ट्रंप की पूर्व पत्नी मार्लो मेपल्स, ट्रंप की बेटी टेफनी ट्रंप, यूएस के हेल्थ सेक्रेटरी रह चुके राॅबर्ट कैनेडी जूनियर, किंग चार्ल्स के तीसरे भाई कपूर राजकीय कुमार एंड्रूस आदि के नाम सामने आ रहे हैं। वैसे अभी तक किसी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष या वहां के किसी प्रभावशाली शख्स का नाम सामने नहीं आया है। सैक्स स्कैंडल भले ही अमेरिकी राजनीति को प्रभावित करता हो, वह भारत जैसे अन्य देशों की राजनीति में कोई मायने नहीं रखता है ! दुनिया को जो सवाल परेशान कर रहा है वह है बैंक रिकार्ड। डोनाल्ड ट्रंप ने जब दूसरी बार जनवरी 2025 में सत्ता सम्हाली थी और एप्स्टिन केस से पीड़ित महिला वर्जनिया ग्रिफे नामक महिला की मौत हुई थी तो कहा गया कि ग्रिफे की मौत में कहीं न कहीं अमेरिकी राजनीतिक सत्ता का हाथ है क्योंकि ट्रंप ने वर्जनिया को चुप कराने के लिए यह सब कुछ किया है। 10 अगस्त 2019 में जब एप्स्टिन की जेल में मरने की खबर आई थी तब भी राजनीति और कारोबार के गठजोड़ की चर्चा चली थी। अमेरिकी होस्ट स्कार बोरो ने ट्यूट करते हुए लिखा था कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अमीर और ताकतवर लोगों की जिंदगी तबाह करने की जानकारी थी उसे जेल में मरवा दिया गया। वैसे यह रूसी तरीका है। इजराइल, रूस, अमेरिका के साथ ही यह खबर भी आई थी कि दुनिया के कई दूसरे देशों ने इस नेक्सेसिस का साथ लिया। क्या भारत के भीतर भी ऐसा कुछ है? यह सिर्फ एक सैक्स स्कैंडल भर नहीं है। यह दरअसल बैंकिंग, प्रोसेस, माफिया, पालिटिक्ल इकोनॉमी या फंडिंग, दुनिया को चलाने वाले ताकतवर देशों की फेहरिस्त में वे नाम जो शायद अपने तौर पर किसी भी देश की राजनीतिक सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हैं अगर इनके नेक्सेस से दुनिया के दूसरे बड़े देशों के नाम जुड़ते हैं जिसमें इजराइल, रूस, अमरिका जैसे नाम सामने आ रहे हैं तो क्या वाकई दुनिया में राजनीतिक परिवर्तन करने की ऐसी व्यवस्था की गई है? दुनिया के भीतर टेरिफ वार के जरिए ट्रंप जिस तरह से नये रास्ते बना रहे हैं तथा अमेरिका को ग्रेट अगेन का जो नारा दे रहे हैं उस पूरी प्रक्रिया में पहले और दूसरे टर्म में काम करने के तरीके बिल्कुल अलग हैं। पहले टर्म में जिन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से ट्रंप की नजदीकियां थी वह दूसरे टर्म में दूरियों में तब्दील हो गई हैं। कहीं इन सबके पीछे आज रात भारतीय समयानुसार रात 2 बजे खुलने वाली फाइल तो नहीं है जो दूसरे दिन (20 दिसम्बर 2025) दुनिया के कई देशों में हंगामा बरपेगी। उसमें कहीं भारत भी तो नहीं होगा ?
दिल्ली का रामलीला मैदान कहीं पूरे देश का मैदान तो नहीं बन जायेगा ?
सरकार द्वारा लायी गई मुद्रा योजना के तहत खातों में डाली गई रकम जो सरकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 55 करोड़ लोगों के खाते में 33 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डाले गये जिसमें देश का हर युवा शामिल है। यानी देश में एक भी युवा बेराजगार नहीं है लेकिन दूसरी तरफ सरकार का ही आंकड़ा बताता है कि तकरीबन साढ़े चार करोड़ युवा ऐसे हैं जिन्होंने अलग - अलग जगहों पर अपना नामांकन बेरोजगारी की वजह से कराया हुआ है यानी देश में इतने रजिस्टर्ड बेराजगार हैं। और अनजरजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या भी सवा दो करोड़ से अधिक है और नौकरी के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां पाने के लिए हाथों में डिग्री लिए घूम रहे हैं। देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और उत्पादन प्रणाली सबसे न्यूनतम और निगेटिव में है। इसमें भी 2014 के पहले वाली स्थिति में लगभग 80 लाख की कमी बरस दर बरस होती चली गई है। देश के भीतर एमएसएमई, छोटी इंडस्ट्रियां जो देश की इकोनॉमी में बड़ा योगदान दे रही थीं उसमें लगभग 19 फीसदी की कमी आ गई है। रोजगार के हिसाब से वह 37 परसेंट नीचे आ गया है।इस देश के भीतर प्रोफेशनली तौर पर पहचाने वाले शहरों में मिलने वाला रोजगार कम होते - होते 42 फीसदी पर आकर खड़ा हो गया है। सूरत, हैदराबाद, लखनऊ, बैंगलुरू, चैन्नई, चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली सहित ऐसे 12 शहर हैं। देश के भीतर हर चुनावी प्रक्रिया में जो पैसा बांटा जाता है इसके बावजूद भी देश की डगमगाती इकोनॉमी का असर यह है कि तमाम राज्यों के ऊपर लदे हुए कर्ज का एवरेज निकाला जाय तो हर राज्य तकरीबन 3.5 से 5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा हुआ है। उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की हालत यह कि अगर वह बीजेपी शासित राज्य है तो उसके मुख्यमंत्री को उफ तक करने की इजाजत नहीं है और गैर बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सामने आहें भरते हुए कर्ज दर कर्ज लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कार्पोरेट किसी भी परिर्वतन की दिशा में सोच भी नहीं सकता अगर उसने सोचने के लिए जैसे ही किसी राजनीतिक दल को फंडिंग की तो तत्काल ही उस पर सीबीआई, आईडी, आईटी का धावा हो जायेगा और उससे की गई फंडिंग का कम से कम 40 फीसदी तो बसूली ही लिया जायेगा । देश के भीतर काम करने वाले बैंकस्, अलग - अलग सेक्टर्स पर पहले डिसइन्वेस्टमेंट के नाम पर पंजा कसा गया और उसके बाद मोनोटाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन के नाम पर गला ही दबा दिया गया। जिसका सीधा असर बीते 11 साल में लगभग 3 करोड़ लोगों पर पड़ा है। जिनका या तो रोजगार खत्म हो गया है या फिर उनको जबरिया रिटायर्मेंट (बीआरएस) लेना पड़ा है। देश की राजनीति करने वाले जो चुनाव के वक्त अपने कार्यकर्ताओं को पैसे बांटा करते थे जो आने वाले दिनों में उन्हें कुछ राहत देता था, उसे भी गुजराती लाॅबी ने हड़प लिया है । हर चुनाव में गुजराती लाॅबी की मौजूदगी उस पूरे पैसे पर कब्जा कर लेती है। बीजेपी और संघ से जुड़े हुए लोगों के पास न तो कोई विचारधारा बची है न ही कोई ऐजेंडा है। अब तो उनके पास एक ही रास्ता है जिसका जिक्र मोहन भागवत ने पोर्ट ब्लेयर में किया जिसको राहुल गांधी ने भी वोट चोर गद्दी छोड़ नारे वाली रैली में यह कह कर दिया कि बकौल मोहन भागवत "ताकत ही सब कुछ है"। यानी राजनीतिक तौर पर आपको चुनावी जीत के लिए मशीन बनना होगा। ये सवाल ऐसे हैं जिससे लोगों के भीतर गुस्सा है, आक्रोश है लेकिन कोई भी राजनीतिक परिवर्तन नहीं ला सकते। क्योंकि देश में मौजूद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के राजनीतिक तौर तरीकों ने देश की उस पूरी पारंपरिक राजनीति को ही खत्म कर दिया है जिस राजनीति के आसरे चुनाव होते थे, सत्ता परिवर्तन होता था। जब पूरी मशीनरी को ही बदल दिया गया है तो फिर चाहे वह राहुल गांधी हों, कांग्रेस हो या फिर पूरा विपक्ष ही क्यों ना हो सत्ता परिवर्तन नहीं कर सकते हैं।
भारत की राजनीति ऐसी कभी नहीं थी। देश के भीतर बनने वाले नियम कायदे, संस्थानों के जरिए चलने वाली सत्ता, संसद और सुप्रीम कोर्ट के जरिए निर्धारित होने वाले न्याय के मापदंड, लोकतंत्र को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका और प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री जिस मुहाने पर आकर खड़े हो गए हैं तो क्या वाकई देश को वैचारिक, राजनीतिक, सियासी, जनता, राजनीति के तौर तरीकों को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। ऐसी परिस्थिति तो इंदिरा गांधी के दौर में लगाई गई इमर्जेंसी के वक्त, मंडल - कमंडल की राजनीति के दौर में, दिल्ली में हुए सिख्ख दंगे, गुजरात में हुए दंगे के दौर में भी पैदा नहीं हुई थी। तब के दौर में देश में सुप्रीम कोर्ट था, चुनाव आयोग था, तमाम संस्थान थे, पार्लियामेंट में ऐसा प्रधानमंत्री भी था जो गुजरात में हुए नरसंहार को लेकर राजधर्म की बात करने से नहीं चूका था। इमर्जेंसी लगाने वाली प्रधानमंत्री ने भी इसका एहसास किया था कि जिस रास्ते वो गई थी वह रास्ता सही नहीं था। लेकिन मौजूदा वक्त में ऐसा कुछ भी नहीं है। यानी सारे के सारे शवासन कर रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक सत्ता सिर्फ सत्ता के आसरे चल रही है और सत्ता का मतलब है वह ताकत जिसके जरिए देश के संविधान को छिन्न - भिन्न कर दिया गया है। छिन्न - भिन्न का मतलब है कि दरअसल अब कोई विचारधारा बची ही नहीं है और जो विचारधारा है उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ सत्ता है।
पहली बार देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सरसंघचालक, इलेक्शन कमीशन को चलाने वाले चीफ इलेक्शन कमिश्नर के साथ दो और सहयोगी का नाम लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान से विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने वोट चोर गद्दी छोड़ नारे वाली रैली को संबोधित करते हुए ऐलान किया कि जो कुछ भी हो रहा है वह सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि वह सत्ता में हैं और जिस दिन सत्ता गई उस दिन देश की जनता इन्हें बख्शेगी नहीं। इतना ही नहीं इन्हें खदेड़ कर बाहर करने के बाद जनता जिस सत्ता को स्थापित करेगी वह स्थापित सत्ता भी नियम कायदे बदलकर इन्हें दंडित करने का काम करेगी। इन बातों को कहना आसान नहीं है यह समझते हुए कि मौजूदा वक्त में मोदी सरकार को वोट मिले हैं लेकिन सवाल यह है कि कल तक इस बात का जिक्र होता था कि चलिए इन्हें वोट मिले हैं इसलिए ये चुनाव जीत कर आये हैं लेकिन इस वक्त तो बकायदा जिस तरह से देश के अलग - अलग प्रांतों के लोगों के हस्ताक्षर युक्त पत्र जो हजारों बोरियों में भरकर आये हैं वह सवाल उठा रहे हैं कि अब देश में वोट चोरी हो रही है, देश का चुनाव आयोग सत्ता के साथ मिला हुआ है। देश की न्यायिक प्रक्रिया को खत्म कर दिया गया है खासतौर पर चुनाव को लेकर। देशभर से आये हस्ताक्षर युक्त पत्रों को आज नहीं तो कल सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को सौंपा जायेगा । लाखों की तादाद में इकट्ठा हुए लोगों ने जिस तरह से वोट चोरी की आवाज उठाई तो क्या वाकई रामलीला मैदान उसका प्रतीक बन गया है। क्योंकि जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री को, गृहमंत्री को खुले तौर पर यह कहते हुए चेतावनी दी गई कि "वो जानते हैं कि हमारी वोट चोरी पकड़ी गई है" । पार्लियामेंट के भीतर बोलते हुए अमित शाह के हाथ इसलिए कांप रहे थे कि वे सिर्फ तब तक बहादुर हैं जब तक हाथ में सत्ता है जैसे ही सत्ता हाथ से छूटेगी सारी बहादुरी हवा हवाई हो जायेगी।
वोट चोरी रैली में दिये गये भाषण ने राममनोहर लोहिया जयप्रकाश नारायण, अटलबिहारी बाजपेई के भाषणों की याद तरोताजा कर दी। जब राममनोहर लोहिया ने नेहरू के खिलाफ, जयप्रकाश नारायण ने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ, अटलबिहारी बाजपेई ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को लेकर दिया था। इसी कड़ी में आरएसएस ने क्रिया की प्रतिक्रिया के तौर पर गुजरात में हुए नरसंहार पर दिया था। आज उसी संघ का सरसंघचालक मोहन भागवत कह रहा है दरअसल "देश में सत्य कोई ताकत नहीं है ताकत तो सत्ता है और ताकत ही भारत का प्रतीक है" यानी मोहन भागवत कहना चाह रहा है कि हरहाल में सत्ता के साथ खड़े होकर सत्ता को साथ लेकर चलना है और यही काम स्वयंसेवक और संघ प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी, अमित शाह बतौर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री करते हुए मौजूदा राजनीतिक सत्ता की पहचान बना रहे हैं। क्या वाकई महात्मा गांधी और संघ परिवार के बीच नाथूराम गोडसे इस तर्ज पर आकर खड़ा हो गया है जहां विचारधारा उस दौर में जब गांधी की हत्या की गई थी तो वह भी सत्ता के लिए थी क्योंकि राहुल गांधी ने जिस सवाल को उठाया है उस सवाल के मूल में यही सच छुपा हुआ है। चाहे वह प्रचारक हो या स्वयंसेवक और संघ जब अपनी भूमिका भी शक्ति के तौर पर देखता है और सच दूर हो जाता है तो इसके मतलब - मायने एक ही हैं कि किसी भी हालत में सत्ता चाहिए। तो क्या देश के भीतर हो रही हर प्रक्रिया सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने के लिए हो रही थी यानी नाथूराम गोडसे से लेकर मंडल - कमंडल, गुजरात के दंगे और मौजूदा वक्त में सत्ता की डोर प्रचारक के हाथ में है तो क्या इसी तरीके की सियासत ही मौजूदा वक्त की वह हकीकत है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों को पढ़ाता है। खुद सरसंघचालक मोहन भागवत ने पोर्ट ब्लेयर में कहा है कि "विश्व सत्य को नहीं शक्ति को देखता है जिसके पास शक्ति है उसे माना जाता है" । भागवत की कही बात से ही राहुल ने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि "ये मोहन भागवत की सोच है, आरएसएस की विचारधारा है जहां सत्य का कोई मतलब नहीं है, सत्ता जरूरी है। हमारी, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म, दुनिया के हर धर्म की विचारधारा कहती है कि सत्य सबसे जरूरी है" ।
जाहिर तौर पर रैली तो वोट चोरी को लेकर थी, देश के भीतर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर थी। रैली इस दौर में सत्ता के उस व्यापक कटघरे को लेकर थी जिसके दायरे में देश के तमाम संस्थान हड़पे जा चुके हैं या उन पर सत्ता काबिज हो गई है। 2014 के बाद जिस तरह से गवर्नेस के तौर तरीके बदले गए हैं और अगर सत्ता बदलती है तो उन तौर तरीकों को नये सिरे मथा जायेगा राहुल गांधी उस लकीर को खींचने का ऐलान कर रहा था। सामान्य तौर पर विपक्ष किसी नौकरशाह का नाम लेकर यह कहता नहीं है कि आपने देश को बरबाद कर दिया है लेकिन राहुल गांधी ने बकायदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता और उसके दोनों सहयोगियों का नाम लेते हुए कहा कि मोदी सरकार ने जो इम्यूनिटी दी है, जिस कानून को ढाल बनाकर सरकार चुनाव जीतने का मंत्र पा चुकी है उसे बदल दिया जायेगा और किसी को बख्शा नहीं जायेगा। क्या विपक्ष जनता से उसके भीतर के गुस्से, आक्रोश के जरिए संवाद बना रहा है या फिर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीति खत्म होने की मुनादी कर रहा है। क्योंकि मौजूदा राजनीतिक सत्ता ने समूची चुनाव प्रक्रिया को ही अपनी पंजे में दबोच लिया है तो फिर चुनाव के जरिए तो परिवर्तन होने से रहा। तो क्या विपक्ष जनता के भीतर व्याप्त गुस्से और आक्रोश को ढाल बनाकर या जनता के साथ खड़े होकर राजनीति को साधने का मंत्र बना रहा है। क्योंकि इसी मंत्र के जरिए 1975 के बाद 1977 में जयप्रकाश नारायण ने व्यापक परिवर्तन की दिशा में सम्पूर्ण क्रांति का नारा लगाते हुए आंदोलन किया था। शायद ऐसा ही कुछ करने के लिए ही राहुल गांधी ने उन तमाम नौकरशाहों का नाम लेते हुए, जो सियासत के ईशारे पर या कहें सियासत के हाथों बंधक हैं, कहा कि "इलेक्शन कमिश्नर बीजेपी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। इनको जितनी भी इम्युनिटी देनी है दे दो। आप मत भूलिए आप हिन्दुस्तान के इलेक्शन कमिश्नर हो आप नरेन्द्र मोदी के इलेक्शन कमिश्नर नहीं हो। आपको साफ कह रहे हैं कि सरकार पर आने के बाद आपको सुरक्षित करने वाले कानूनों को बदल दिया जायेगा और आपके खिलाफ एक्शन लिया जायेगा"। यह मैसेज इतना भर नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या मौजूदा राजनीतिक सत्ता को इस बात का एहसास है कि बीते 11 बरसों से वह जिस रास्ते चल रही है वह रास्ता असंवैधानिक है, गैरकानूनी है। वह रास्ता सिर्फ और सिर्फ कानूनी तौर पर दिखलाते हुए सत्ता पाने के बाद देश के कानून को ही अपने हाथों में दबोचने का है।
ऐसी परिस्थिति तो इससे पहले देश के भीतर कभी नहीं रही है। जनता के सामने चुनौतियां नहीं मुश्किल हालात हैं जो अभी तक देश में आजादी के बाद संसदीय राजनीति के आसरे चलने के थे। उसके तौर तरीके बदल गये हैं तो सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के सामने है क्योंकि वे जिस रास्ते चल रहे हैं उस रास्ते को उन्हें और एग्रेसिवली देश में लाना होगा अन्यथा सत्ता खिसक गई तो विपक्ष का नेता कह रहा है कि छोड़ेंगे नहीं। चुनाव आयुक्तों को कह रहा है छोड़ेंगे नहीं। यह चेतावनी ईडी, सीबीआई, आईटी के मुखियाओं को भी दी जा चुकी है। यानी यह मैसेज टकराव का है। ये मैसेज व्यापक परिवर्तन की दिशा में बढ़ते हुए उन कदमों का है जो जान गये हैं कि दरअसल चुनाव के आसरे कुछ नहीं होगा। सवाल है कि क्या देश की राजनीतिक परिस्थितियां खुद को जनता या नागरिक में तब्दील कर पार्लियामेंट के भीतर और पार्लियामेंट के बाहर निकल कर उस रास्ते पर चलने को तैयार हैं जिस रास्ते की सोच रामलीला मैदान से राहुल गांधी देना चाह रहा है या यह सिर्फ कहने की बात है। लेकिन कहते हैं कि आहट की शुरुआत में बहुत छोटी होती है। इसीलिए शायद असल टेस्ट तो पश्चिम बंगाल में है जिसमें अगर ममता हारी तो फिर क्या स्टालिन और क्या केरला। कौन सा राज्य, कौन सी राजनीति, कौन सा राजनीतिक दल कोई नहीं बचेगा। बिहार में तो नितीश कुमार के रूप में एक ढाल थी लेकिन बंगाल में कोई ढाल नहीं है। सीधी और स्पष्ट लड़ाई है। उस लड़ाई में चुनाव आयोग कितना बड़ा प्लेयर साबित होगा ? वह भारत की आगामी राजनीति को तय भी करेगा और रामलीला मैदान के भीतर से निकली हुई उन आवाजों को रास्ता भी दिखायेगा। या फिर दिल्ली का रामलीला मैदान कहीं पूरे देश का मैदान तो नहीं बन जायेगा ? ऐसी परिस्थिति भी देश में अभी तक तो नहीं आई है। आजादी के बाद भारत की राजनीति पहली बार उस चौखट पर आकर खड़ी हो गई है जिस चौखट के दरवाजे संविधान और संस्थान - संसदीय राजनीति और चुनाव के लिए बंद हो चुके हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का सेल्फ गोल है संसद के भीतर वंदेमातरम पर चर्चा करवाना
जिस दिन वंदेमातरम देश की शिराओं में दौड़ने लगेगा उसी दिन सभी के मुगालते खत्म हो जायेंगे, जिस दिन लोग कार्पोरेट, सत्ता और संविधान के भीतर देश की मौजूदा परिस्थितियों को समझ जायेंगे उस दिन वंदेमातरम गान संसद में नहीं बीच चौराहे पर होगा
"हे माँ तेरी धरती जल से भरपूर है। फल - फूल से लदी हुई है। मलय पर्वत की ठंड़ी सुगंध से शीतल है। खेतों में लहलहाती फसल से आच्छादित है। तेरी रातें चांदनी से नहा कर पुलकित हो उठती है और वृक्ष खिले फूलों और पत्तों से सजे रहते हैं। तू मुस्कान बिखेरने वाली, मधुर वाणी बोलने वाली, सुख देने वाली है। तेरे करोड़ों पुत्रों के गले से उठी आवाज गगन में गूंजती है और करोड़ों भुजाओं में तलवारें और अस्त्र-शस्त्र चमकते हैं। कौन कहता है कि तू निर्बल है। माँ तू अपार शक्ति है। संकट से पार लगाने वाली है और शत्रुओं का नाश करने वाली है। तू ही ज्ञान है, धर्म है, हृदय है और तू ही जीवन का सार है। तू प्राण है। भुजाओं की शक्ति है और हृदय की भक्ति है। हम तुझे ही पूजते हैं। हे माँ तू ही दशों अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली माॅं दुर्गा है। कमल के आसन पर विराजमान माॅं लक्ष्मी है। तू माॅं सरस्वती है। हे निर्मल माॅं मैं तुझे प्रणाम करता हूं" । वंदेमातरम का यह हिन्दी भावानुवाद श्री अरविंद घोष ने किया है जिनकी पहचान एक योगी और दार्शनिक के तौर पर है। यानी भारत की ताकत है, भारत की भूमि की ताकत है, देश के भीतर समाये हुए प्राकृतिक परिस्थितियों से जो उर्जा मिलती है लोगों को।
लेकिन इस दौर में सब कुछ खत्म, ध्वस्त कर दिया गया है। सरकार न शुध्द पानी दे पा रही है न वायु। न ही जमीन की उर्बरा दे पाने की स्थिति में है न ही किसानों के साथ खड़ी हो पा रही है। न ही संघर्ष के आसरे देश के भीतर उठते हुए सवालों का जवाब दे पा रही है। संसद के गलियारों में सिर्फ उन्हीं मुद्दों को चर्चा के क्यों खोजा जाता है जो चर्चा राजनीतिक तौर पर राजनीतिक दायरे में देश की जनता को लाकर खड़ा करना चाहती है। यानी भारत की संसद के कोई सरोकार देश के साथ हैं ही नहीं। संसद में बैठे सांसदों को जनता चुनती जरूर है तो उस पर भी कब्जा हो गया है। पता नहीं वोट गिने भी जाते हैं या नहीं। मगर सांसदों का देश से तो छोड़िए अपने ही संसदीय क्षेत्र की उस जनता से जो उसे वोट देती है उससे भी कोई जुड़ाव नहीं रहता है। हाल ही में जब देश का आम नागरिक हवाई यात्रा को लेकर परेशान है। सांसदों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही है क्योंकि उनकी हवाई यात्रा के लिए तो 24 × 7 चार्टर प्लेन मौजूद रहते हैं। सबसे ज्यादा दिल्ली और मुंबई में उसके बाद हैदराबाद और विशाखापट्टनम का नम्बर आता है। देश के राज्यों की राजधानी में भी व्यवस्था रहती ही है चार्टर प्लेन की। भारत के भीतर तकरीबन 17 हज़ार चार्टर प्लेन मौजूद हैं। राजनीति को उड़ान भरने की व्यवस्था है तो फिर क्यों कर सरोकार रखें आम आदमी से। वंदेमातरम की चर्चा के बीच में हवाई जहाज का जिक्र क्यों ? हवाई जहाज का जिक्र इसलिए कि जेब में पूंजी रखे हुए लोग भी तो समझें कि उनसे भी देश की सत्ता के कोई सरोकार नहीं है।
सत्ता जब वंदेमातरम पर चर्चा कर रही है तो उस चर्चा के साथ वही राजनीति हिलोरें मार रही है जिस राजनीति के आसरे उसको सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बन सके। इसलिए कोई उसमें बंगाल में होने वाले चुनाव की राजनीति को खोज रहा है। कोई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ रहा है। कोई नेशनलिज्म जगाना चाहता है। कोई देश के मूलभूत मुद्दों से देश को ही दरकिनार करने की कोशिश कर रहा है। तो कोई अतीत के नायकों को खारिज कर रहा है। कोई अतीत की उन परिस्थितियों से मौजूदा वक्त की परिस्थितियों को यह कह कर बेहतर बताने से हिचक नहीं रहा है कि असल रामराज्य तो अभी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद के भीतर वंदेमातरम पर हो रही चर्चा की शुरुआत करते हुए तकरीबन एक घंटे तक भाषण दिया। उसमें 121 बार वंदेमातरम, 50 बार कंट्री याने देश शब्द, 35 मर्तबा भारत शब्द, 34 बार अंग्रेज शब्द, 17 बार बंगाल का जिक्र, 10 बार बंकिम चंद्र चटर्जी का नाम, 7 बार जवाहरलाल नेहरू का नाम, 6 मर्तबा महात्मा गांधी का नाम लिया गया। उस भाषण में 5 बार मुस्लिम लीग, 3 बार जिन्ना, 3 बार संविधान का का नाम भी लिया गया। 2 मर्तबा मुसलमान, 3 बार तुष्टीकरण, 13 मर्तबा कांग्रेस का भी जिक्र किया गया लेकिन एक बार भी जनसंघ, संघ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम नहीं लिया गया। आखिर क्यों ? जबकि भाषण तो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दे रहे थे जो खुद संघ के स्वयंसेवक, प्रचारक रह चुके हैं आज भी उनका संघ से जुड़ाव बरकरार है। देश के भीतर तिरंगा के साथ ही भगवा भी लहराते हैं। अपने हर भाषण के बाद वंदे शब्द का इस्तेमाल उसी तर्ज पर करते हैं जैसे कोई स्वयंसेवक भाषण देता है।
वंदेमातरम पर चर्चा के दौरान पूरे सदन (जिसमें आसंदी भी शामिल है) ने अपनी अज्ञानता, अपरिपक्वता का परिचय दिया है। सत्ता पक्ष ने तो आज जिस तरह से वंदेमातरम को अपमानित किया है उसकी मिशाल शायद ही मिले। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस समय सदन में प्रवेश कर रहे थे और सांसद फूहड़ता के साथ वंदेमातरम का नारा लगा रहे थे। वंदेमातरम का गायन किया जाता है और जब - जब वंदेमातरम का गायन होता है या किया गया है चाहे वह 1896 में कोलकाता में हुआ कांग्रेस का अधिवेशन हो जिसमें रविंद्रनाथ टैगोर ने गायन किया था या फिर संविधान सभा की शुरुआत रही हो तब सभी खामोशी के साथ खड़े होकर गायन करते थे लेकिन सत्तापक्ष इतना अहंकारी हो गया कि उसने वंदेमातरम को नारे में तब्दील कर दिया है । विपक्ष हूट करता रहा और आसंदी एक जरखरीद गुलाम की तरह चुपचाप बैठी रही। संविधान सभा की भाषा, संविधान सभा के भीतर तर्क, उसमें होने वाली बहस और उस बहस के बाद बने संविधान (जिसमें भारत के हर प्रांत के लोगों की मौजूदगी थी) जिसमें यह मानकर चला गया कि देश का एक संविधान होगा। उस संविधान के आसरे सरकारें चलेंगी। उस सरकार के हिस्से में कौन सा काम है निर्धारित किया गया। पार्लियामेंट को कैसे चलाना है यह भी बताया गया। लेकिन उसमें इस बात का जिक्र नहीं किया गया क्योंकि किसी ने भी नहीं सोचा था कि कभी सत्ता में ऐसे लोग भी आयेंगे जो देश के भीतर आजादी से पहले लिखी गई रचनाओं को ही विवादित बना देंगे। 1950 में संविधान को लागू किया गया। किसने सोचा था कि देश का हर संवैधानिक संस्थान राजनीतिक मुट्ठी में इस तरीके से समा जायेगा जहां पर देश को चलाने के लिए जो संसद का काम है उसे ही भूल जायेंगे। यानी गवर्नेंस का मतलब क्या होता है, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का क्या मतलब है इस संसद को पता नहीं है। संसद और सांसद को यह भी पता नहीं है कि जिन बातों का जिक्र वो कर रहे हैं उन बातों को लागू कराना भी उनकी ही जिम्मेदारी है।
वंदेमातरम 1875 में लिखा गया उसके बाद आनंदमठ नामक उपन्यास की रचना की गई। जिसमें वंदेमातरम को डाल कर 1882 में छापा गया। इसके बाद बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की यह रचना एक कालजयी उपन्यास के तौर पर भारत के मानस पटल पर छा गया। तो जाहिर है कि वंदेमातरम भी भारत के जहन में आया। रविंद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कोलकाता में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में इसका गायन किया था। उसके बाद 1947 में संविधान सभा की बैठक की शुरुआत ही सुचेता कृपलानी के वंदेमातरम गायन से हुई थी।1950 में संविधान लागू होने पर वंदेमातरम को राष्ट्रीय गीत बनाया गया और इसे राष्ट्रीय गान जन-गण-मन के समानांतर दर्जा दिया गया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदेमातरम की रचना कर जिस भारत की कल्पना की, जिसका गायन करते हुए रविंद्रनाथ टैगोर ने सोचा समझा, जिस गीत के आसरे संविधान सभा ने संविधान बनाया और 2025 में सत्ताधारी पार्टी इस बात का जिक्र कर रही है कि उस दौर के नायक आज के दौर के खलनायक हैं तो यह मान कर चलिए कि इससे ज्यादा विभत्स कुछ हो नहीं सकता है। वंदेमातरम की रचना के 150 बरस होने पर संसद के भीतर जो चर्चा हो रही है उसका एक सच यह है कि 100 बरस होने पर देश में इमर्जेंसी लगाकर संविधान को हाशिये पर धकेल दिया गया था। दूसरा सच यह है कि 109 बरस में देश के भीतर सिख्खों का नरसंहार हुआ था तो 127 बरस होने पर गुजरात में भी नरसंहार हुआ था।
किस - किस पत्थर को उठाकर उसके नीचे झांक कर देखिएगा। क्या वंदेमातरम को याद करते हुए मौजूदा देश की त्रासदी या उसके घाव से रिसते हुए खून और पस (मवाद) को देख कर शांति महसूस की जा सकती है और अगर की जा सकती है तो फिर नरपिशाच और हममें कोई अंतर नहीं है। मगर मौजूदा राजनीति की यही विधा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वंदेमातरम के पीछे खड़े होकर अपनी राजनीति साधने के लिए जिस तरीके से एक चौथाई सच और तीन चौथाई झूठ को परोसा उससे एक बार फिर उनकी ओछी राजनीति नग्न हो गई। विपक्ष को खुलकर मोदी, बीजेपी और संघ की कलई खोलने का मौका दे दिया। अखिलेश यादव ने तो खुलकर कहा कि आप (बीजेपी) राष्ट्रवादी नहीं राष्ट्रविवादित हैं। प्रियंका गांधी ने तो यहां तक कहा कि जिस नेहरू को आप खलनायक कह रहे हैं वो जितने साल (12) से आप सत्ता में हैं उतने साल उन्होंने देश की आजादी के आंदोलन में भाग लेते हुए जेल में बिताए हैं और आजादी के बाद 17 साल तक प्रधानमंत्री रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वंदेमातरम की आड़ में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण का एक ऐसा खतरनाक खेल खेलना शुरू किया है जहां अब ध्रुवीकरण करने के लिए हिन्दू - मुसलमान की जगह राष्ट्रवाद का नाम लिया जा रहा है। संस्थागत तरीके से इतिहास को बदलने के लिए झूठ का मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश की जा रही है। एसआईआर के काम में लगे बीएलओ की मौतें, इंडिगो संकट, दिल्ली में हुआ आतंकी हमला, प्रदूषण, रूपये का लगातार हो रहा अवमूल्यन, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, मंहगाई, बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, किसान - मजदूर हित, युवाओं में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति आदि ऐसे ढ़रों मुद्दे हैं जिन पर संसद के भीतर बहस होनी चाहिए। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद के भीतर 150 बरस पहले लिखे गये गीत वंदेमातरम पर चर्चा करा रहे हैं। देखा जाय तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह दुस्साहस अकारण नहीं है। वे तो हरहाल में उन ताकतों से मुक्त होना चाहते हैं जिनकी बदौलत संविधान सुरक्षित है, बचा हुआ है। क्योंकि यही वह संविधान है जो देश में तानाशाही कायम नहीं होने दे रहा है। लोगों को हिम्मत देता है कि अगर उन्हें सरकार का कोई फैसला पसंद न आये या उसमें उन्हें अपना हित खतरे में पड़ता हुआ दिखता है तो उसके खिलाफ आवाज उठायें।
संविधान की दी हुई ताकत की बदौलत ही किसानों ने मोदी सरकार द्वारा लाये गए किसान विरोधी कानूनों का विरोध किया था और मोदी सत्ता को तीनों कृषि कानून वापस लेने मजबूर होना पड़ा था। हाल ही में लाये जा रहे संचार साथी ऐप प्री - इंस्टाल करने का फैसला टालना पड़ गया। वक्फ़ संशोधन अधिनियम को संसदीय समिति को भेजना पड़ा। मतलब मोदी सरकार को अपने फैसलों से पीछे हटना पड़ रहा है और यही बात उसे खटक रही है। वंदेमातरम की चर्चा में पीएम मोदी ने जिस तरह का भाषण दिया वह वंदेमातरम का मुखौटा लगाकर देश को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतों को बढ़ावा देने वाला है। लगता है कि नरेन्द्र मोदी उसी लकीर को फिर से खींचने की कोशिश कर रहे हैं जो कभी उनके पुरखों यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा ने खींची थी। आजादी की लड़ाई वाले इतिहास में तो कहीं भी इस बात के सबूत नहीं मिलते कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा ने आजादी की लड़ाई में कोई योगदान दिया हो, बल्कि इस बात के सबूत जरूर मिलते हैं कि वी डी सावरकर ने सजा से बचने के लिए अंग्रेजों से माफी मांगी थी और सेवा का वचन दिया था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग अंग्रेजों की मुखबिरी किया करते थे। जनता को अंग्रेजी फौज में भर्ती होने के लिए उकसाते थे।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने लंबे भाषण में यह तो बताया कि जवाहरलाल नेहरू मुस्लिम लीग के सामने झुकते थे लेकिन यह नहीं बताया कि 1937 में ब्रिटिश इंडिया के कुल 11 राज्यों के हुए चुनाव में मुस्लिम लीग एक भी राज्य में नहीं जीत पाई जबकि कांग्रेस ने बहुमत के साथ 7 राज्यों में सरकार बनाई थी । मोदी ने यह भी नहीं बताया कि 1941-42 में सावरकर की हिन्दू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर तीन राज्यों में सरकार बनाई थी। मोदी ने इस बात का भी जिक्र नहीं किया कि जब देश आजाद हुआ तो 15 अगस्त 1947 की आधी रात को संविधान सभा में श्रीमती सुचेता कृपलानी ने वंदेमातरम का गायन किया था। 24 जनवरी 1950 के दिन वंदेमातरम को राष्ट्रगीत घोषित किया गया था तब कांग्रेस की सरकार थी और जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री थे। कांग्रेस के अधिवेशन में आज भी वंदेमातरम का गायन होता है। यह भला मोदी अपने मुंह से कैसे बोल सकते थे। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जो कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं और बतौर स्वयंसेवक अभी संघ से उनका जुड़ाव है तो वे अपने भाषण में इस बात का खुलासा तो कर ही सकते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आजादी के पहले और आजादी के बाद कई दशकों तक तिरंगे से परहेज क्यों किया तथा वंदेमातरम को अपना गीत क्यों नहीं बनाया। यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सही मायने में पूरी ईमानदारी के साथ इतिहास को सुधारने की मंशा रखते हैं तो उसकी शुरुआत उन्हें अपने मातृ - पितृ संगठनों से करनी चाहिए। मगर नरेन्द्र मोदी का असल मकसद तो निकट भविष्य में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव को साधने का है। हर तरह की कोशिश करने के बाद भी बंगाल सध नहीं रहा है। वंदेमातरम के तार बंगाल से जुड़ते हैं। पिछले चुनावों में सुभाष चंद्र बोस को भुनाने के बाद रविन्द्र नाथ टैगोर की तरह दाढ़ी बढ़ाकर चुनाव प्रचार किया लेकिन यह भूल गये कि रविन्द्र नाथ टैगोर की पहचान उनकी दाढ़ी नहीं उनकी सोच और लेखनी है। इस बार बंकिम चंद्र और उनकी अमर रचना वंदेमातरम पर दांव लगाया जा रहा है। जो कि एक खतरनाक खेल की शुरुआत है और इससे देश को कहीं ज्यादा गहरे जख्म मिलेंगे।
आज के दौर में न तो संसद न ही सांसद लोगों से जुड़े हुए दिखाई दे रहे हैं। देश की जीडीपी से ज्यादा ग्रोथ कार्पोरेटस् की हो रही है, सांसदों की ग्रोथ भी कार्पोरेटस् से कम नहीं है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष सबने देश को जी भर कर लूटा है और यह क्रम निरंतर जारी है। 2014 के पहले करप्शन अंडर टेबिल था 2014 के बाद से करप्शन को सिस्टम का हिस्सा बना दिया गया। 2014 के पहले जांच ऐजेसियां प्रीमियर कहलाती थी लेकिन माना जाता था कि वे सरकार पर आंच नहीं आने देंगी लेकिन 2014 के बाद यही प्रीमियर जांच ऐजेसियां केवल और केवल सरकार को बनाये रखने के लिए काम करने लगी हैं। 2014 के बाद देश के चारों पिलर न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया पूरी तरह धराशाई हो चुके हैं। भारत का मतलब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर दिया गया है। वंदेमातरम की पहचान को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश करते हुए अतीत के दौर की परिस्थितियों को उठाकर ये कहने चूक नहीं रहे हैं कि अगर ये किया होता, वो किया होता, तो ऐसा हो जाता, वैसा हो जाता।
विपक्ष मुगालते में है कि देश के भीतर जेन-जी जाग जायेगा। जेन-जी इस मुगालते में है कि विपक्ष राजनीतिक समाधान कर देगा। देश का वोटर इस मुगालते में है कि उसके वोट के जरिए सत्ता परिवर्तन हो जायेगा। देश की सत्ता भी मुगालते में है कि जब सब कुछ उसकी मुट्ठी में है तो फिर कौन हिम्मत करेगा। लेकिन जिस दिन वंदेमातरम के गीत में लिखे हुए शब्द देश की शिराओं में दौड़ने लगेगा उस दिन किसी को कोई मुगालता नहीं रहेगा। वंदेमातरम गीत के बीच का पैरा बहुत साफ तौर पर कहता है "कौन कहता है तू निर्बल है माँ, तू अपार शक्ति है, तू संकट से पार लगाने वाली है और शत्रुओं का नाश करने वाली है, तू ही ज्ञान है, धर्म है, हृदय में है, तू ही जीवन का सार है, तू प्राण है, भुजाओं की शक्ति है और हृदय की भक्ति है, हम तुझे ही पूजते हैं माँ। और उस माँ का मतलब पार्लियामेंट नहीं है। उस माँ का मतलब सत्ता नहीं है। उस माँ का मतलब चुने जाने वाला प्रतिनिधि नहीं है। उस माँ का मतलब प्रधानमंत्री भी नहीं है। उस माँ का मतलब वही भारत है जिसके भीतर मौजूदा वक्त में लोगों की आय देश की आय के सामने कहीं टिकती ही नहीं है। दुनिया के भीतर जिन लोगों की आय सबसे कम है उस कतार में भारत के 82 फीसदी लोग खड़े हैं यानी 100 करोड़ से भी ज्यादा, दुनिया के सबसे रईस लोगों की कतार में भारत के 50 लोग खड़े हैं। जिस दिन लोग कार्पोरेट, सत्ता और संविधान के भीतर झांकते हुए देश की मौजूदा परिस्थितियों को समझ जायेंगे उस दिन वंदेमातरम का गान होगा और लोग खामोशी के साथ खड़े होकर सुनेंगे और यह संसद के भीतर नहीं बीच चौराहे पर होगा।