
जब भारत की आधी से ज्यादा आबादी रात दो बजे निद्रा में लीन होगा तभी भारत के एक चौथाई से भी कम हाई प्रोफाइल लोगों की नींदे उड़ी हुई अमेरिका में खुल रही एक फाइल को टकटकी लगाये देख रही होगी कि कहीं उसमें उनका नाम तो नहीं है और उन लोगों में खासतौर पर राजनीतिक सत्ता, राजनीतिक दलों से जुड़े हुए लोग और बड़ बड़े कार्पोरेट्स की जमात होगी। ऐसा नहीं है कि इस खुलती फाइल से भारत भर के भीतर खलबली है बल्कि पूरी दुनिया के नामचीनों की धड़कनें बढ़ी हुई है। दुनिया भर के देशों के साथ ही भारत में भी इस बात को लेकर चर्चा चल रही है कि क्या भारत के भीतर राजनीतिक भूचाल तो नहीं आ जायेगा सुबह होते - होते। भारत की राजनीतिक सत्ता और कार्पोरेट्स या फिर अपने - अपने तरीके से दुनिया में अपनी पहचान बना चुके नेताओं और कार्पोरेट हाउसेज की फेहरिस्त भी उसी लकीर पर तो नहीं खड़े हैं जहां पर दुनिया के जाने-माने शख्सियतों की कतार इस वक्त खड़ी नजर आ रही है ? बताया जा रहा है कि इस फाइल में एक लाख से ज्यादा पन्ने हैं जिसमें बैंक रिकार्ड भी है और लगभग 95 हजार तस्वीरें (अश्लील) हैं। मामला सिर्फ और सिर्फ यौन शोषण से नहीं जुड़ा हुआ है बल्कि यह सब चलता कैसे है? दुनिया की ताकत कैसे खुद को इसके पीछे छिपा लेती है? इसका गठजोड़ अपने तरीके से एक माफिया की तर्ज पर तो नहीं है ? यह सवाल अमेरिका से लेकर दुनिया के नामचीन शख्सियतों को लेकर है। लोकतांत्रिक देशों में तो इसे नैतिकता बोध के साथ भी जोड़ कर देखा जाता है। इस फाइल से जिन्न के आसरे निकलने वाले तथ्यों को यह मानकर चला जा रहा है कि इसमें न तो सब कुछ झूठ होगा न ही सब कुछ सच होगा क्योंकि इस कुछ सच के दायरे में हवाई यात्राओं के रिकॉर्ड और फारेंसिक रिपोर्ट भी हैं। एप्सिन की 2019 में हुई मौत के बाद खुलने वाली फाइल में वे सारे दस्तावेज होने की बात कही जा रही है कि जिसमें किस तरह से दुनिया के तमाम देशों में किस तरीके से सत्ता और सियासत चलती थी वे सब सामने आ जायेंगे। अब तक क्या क्या छिपाया गया जिसमें लोगों के नाम और उनकी तस्वीरें शामिल है सब उजागर हो जायेगा क्योंकि अमेरिकी अदालत ने 18 दिसम्बर 2025 के बाद इसे उजागर करने का आदेश दिया है। अमेरिकी अदालत ने अपने आदेश में बहुत साफतौर पर कहा है कि किसी भी डाक्यूमेंट्स को इसलिए नहीं छिपा सकते हैं कि उससे किसी को शर्मिंदगी होगी, किसी की छबि खराब होगी। वह राजनीतिक तौर पर संवेदनशील है। शायद इसीलिए दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों की नजर इस फाइल के खुलने पर लगी हुई है। इसमें उन लोगों के नामों का खुलासा होगा जो सैक्स रैकट चलाने वाले से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जूड़े हुए थे। शायद इसी को लेकर भारत के भीतर कार्पोरेट हाउसेज और राजनीतिक सत्ता की बैचेनी बढ़ी हुई दिख रही है। तो क्या यह भारत की राजनीतिक सत्ता की संवेदनशीलता को प्रभावित करेगी? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि जेफरी एप्स्टिन अपने जीवनकाल में एक समय दुनिया के ज्यादातर ताकतवर नेताओं का चहेता रहा है। उसके अपने प्राइवेट जहाज और आइलैंड थे जहां पर वह सीक्रेट पार्टियां आयोजित करवाता था। इन जगहों पर वह आने वाले हाई प्रोफाइल लोगों को अय्याशी के लिए कम उम्र के लड़के और लड़कियों को मुहैया करवाता था। पार्टीज में केवल सैक्स भर नहीं होता था यहां पर राजनीतिक फंडिंग भी होती थी जिसके आसरे अलग अलग देशों में अलग अलग तरीके से राजनीति को प्रभावित करने का खेल खेला जाता था। सत्ता को बनाने - बिगाड़ने के लिए आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय तौर पर बिसात बिछाई जाती थी। सवाल तो यह भी उठाया जा रहा है कि क्या इस स्कैंडल के पीछे इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद का भी हाथ है? एक कहानी तो यह भी चल रही है कि जेफरी एप्स्टिन और उसकी गर्लफ्रेंड गिसन मैक्सवेल ने जासूसी के मकसद से दुनिया की बड़ी बड़ी हस्तियों और नेताओं को हनीट्रैप करते थे और हनीट्रैप के बाद ब्लैकमेल की परिस्थितियों को पैदा कर राजनीतिक सत्ता को डिगाने, बनाने के लिए पार्टिकल्स फंडिंग के लिए चौसर बिछाई जाती थी जिसमें दुनिया के बड़े बड़े बैंकों की भी भागीदारी होती थी। इसीलिए खुलने वाली फाइल पनामा स्विस पेपर की तर्ज पर नहीं है ना ही यह स्विस बैंक के कुछ डाक्यूमेंट है। ड्राॅप साइट बेबसाइट में बहुत साफ तौर पर लिखा है कि 2013 से 2015 के बीच इजराइली सीक्रेट एजेंट योनो कोरन ने तीन बार एप्स्टिन के मैनहटन वाले अपार्टमेंट में 1015 दिन बिताये थे। एप्स्टिन के ईमेल रिकार्ड वाले डाक्यूमेंट के भीतर साफ तौर पर पता चलता है कि योनो कोरन - एप्स्टिन और इजराइल सरकार एक दूसरे से कम्युनिकेट थे और पूर्व इजराइली प्रधानमंत्री एहूद बराक और एप्स्टिन के बीच कई ईमेल का आदान प्रदान था जिसमें पैसों के लेनदेन का जिक्र है।

भारत के भीतर 2013 से 2015 के बीच जो राजनीतिक परिस्थितियां डामाडोल हुई थी। क्या इजराइल और मोसाद की भागीदारी जो बेबसाइट के जरिए नजर आती है वह भारत की राजनीतिक सत्ता को प्रभावित करती है क्या ? पूरी फाइल खुलने के पहले ही दुनिया भर के तमाम राष्ट्राध्यक्षों खासतौर पर जो सत्ता में है, तमाम कार्पोरेट्स और बड़े बड़े बिजनेसमैनों की सांसे इसलिए फूली हुई हैं क्योंकि अभी तक जिन हाई प्रोफाइल लोगों के नाम सामने आये हैं उनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिलक्लिंटन, प्रिंस एंड्रूज जैसे दिग्गज शामिल हैं। अभी तक एप्स्टिन के आईलैंड में तफरी करने वाले नामचीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व राष्ट्रपति बिलक्लिंटन, पूर्व फाइनेंस सेक्रेटरी लेरी समर्स, सांइंस्टिस्ट स्टीफन हैकिंग, प्रोफेसर नमचोस्की, अमेरिकी खरबपति ईलाॅन मस्क, पाप स्टार माइकल जैक्सन, सिंगर काॅटिनालव, माॅडल नओमी कैमबल, काॅमेडियन क्रिसटकर, ट्रंप की पूर्व पत्नी मार्लो मेपल्स, ट्रंप की बेटी टेफनी ट्रंप, यूएस के हेल्थ सेक्रेटरी रह चुके राॅबर्ट कैनेडी जूनियर, किंग चार्ल्स के तीसरे भाई कपूर राजकीय कुमार एंड्रूस आदि के नाम सामने आ रहे हैं। वैसे अभी तक किसी दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्ष या वहां के किसी प्रभावशाली शख्स का नाम सामने नहीं आया है। सैक्स स्कैंडल भले ही अमेरिकी राजनीति को प्रभावित करता हो, वह भारत जैसे अन्य देशों की राजनीति में कोई मायने नहीं रखता है ! दुनिया को जो सवाल परेशान कर रहा है वह है बैंक रिकार्ड। डोनाल्ड ट्रंप ने जब दूसरी बार जनवरी 2025 में सत्ता सम्हाली थी और एप्स्टिन केस से पीड़ित महिला वर्जनिया ग्रिफे नामक महिला की मौत हुई थी तो कहा गया कि ग्रिफे की मौत में कहीं न कहीं अमेरिकी राजनीतिक सत्ता का हाथ है क्योंकि ट्रंप ने वर्जनिया को चुप कराने के लिए यह सब कुछ किया है। 10 अगस्त 2019 में जब एप्स्टिन की जेल में मरने की खबर आई थी तब भी राजनीति और कारोबार के गठजोड़ की चर्चा चली थी। अमेरिकी होस्ट स्कार बोरो ने ट्यूट करते हुए लिखा था कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास अमीर और ताकतवर लोगों की जिंदगी तबाह करने की जानकारी थी उसे जेल में मरवा दिया गया। वैसे यह रूसी तरीका है। इजराइल, रूस, अमेरिका के साथ ही यह खबर भी आई थी कि दुनिया के कई दूसरे देशों ने इस नेक्सेसिस का साथ लिया। क्या भारत के भीतर भी ऐसा कुछ है? यह सिर्फ एक सैक्स स्कैंडल भर नहीं है। यह दरअसल बैंकिंग, प्रोसेस, माफिया, पालिटिक्ल इकोनॉमी या फंडिंग, दुनिया को चलाने वाले ताकतवर देशों की फेहरिस्त में वे नाम जो शायद अपने तौर पर किसी भी देश की राजनीतिक सत्ता को हिलाने की ताकत रखते हैं अगर इनके नेक्सेस से दुनिया के दूसरे बड़े देशों के नाम जुड़ते हैं जिसमें इजराइल, रूस, अमरिका जैसे नाम सामने आ रहे हैं तो क्या वाकई दुनिया में राजनीतिक परिवर्तन करने की ऐसी व्यवस्था की गई है? दुनिया के भीतर टेरिफ वार के जरिए ट्रंप जिस तरह से नये रास्ते बना रहे हैं तथा अमेरिका को ग्रेट अगेन का जो नारा दे रहे हैं उस पूरी प्रक्रिया में पहले और दूसरे टर्म में काम करने के तरीके बिल्कुल अलग हैं। पहले टर्म में जिन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से ट्रंप की नजदीकियां थी वह दूसरे टर्म में दूरियों में तब्दील हो गई हैं। कहीं इन सबके पीछे आज रात भारतीय समयानुसार रात 2 बजे खुलने वाली फाइल तो नहीं है जो दूसरे दिन (20 दिसम्बर 2025) दुनिया के कई देशों में हंगामा बरपेगी। उसमें कहीं भारत भी तो नहीं होगा ?

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार