
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी 100 बरस की यात्रा में आकर ऐसे अंतर्द्वंद्व में फंसा हुआ दिखाई दे रहा जहां वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह 100 के बाद भटक गया है या फिर भटका हुआ संघ अब अपने लिए नये रास्ते तलाशना चाह रहा है। जबकि हकीकत यह है कि राजनीतिक तौर पर मौजूदा सरकार उसके प्रचारक द्वारा चलाई जा रही है जिसने उसको वैचारिक तौर पर संकट में लाकर खड़ा कर दिया है। जबसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बना यानी 1925 उस पूरे सफर में यानी हेडगेवार, गुरू गोलवलकर, देवरस, रज्जू भैया, कुप्स सुदर्शन तक किसी ने भी संघ को वैचारिक तौर पर चुनौती दी नहीं है। अब जब संघ की बागडोर मोहन भागवत के हाथ में है तो उसे सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक तौर पर ही मिल रही है। अपनी वैचारिक विरासत को बचाये और बनाये रखने के लिए अंतिम रास्ता एक ही है महात्मा गांधी की विचारधारा से टकराना मगर आरएसएस में इतनी कूबत नहीं है कि वह अपनी वैचारिक परिस्थितियों के जरिए महात्मा गांधी की विचारधारा को खारिज कर दे। तो इसके लिए उसे राजनीतिक सत्ता अपने प्रचारक की चाहिए लेकिन उस सत्ता को लेकर भी अंतर्विरोध है इसीलिए मोहन भागवत ने कोलकाता में खुलकर कहा कि जो कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू हैं। यह नारा अपने आप में कोई मायने नहीं रखता है, इससे काम चलने वाला नहीं है। आपने देश के लिए क्या किया है यह बताना और समझाना होगा। यह नारा देश में राजनीतिक तौर पर बीजेपी ने मंडल - कमंडल की लड़ाई में आत्मसात किया था। आजादी की लड़ाई और देश को मिली आजादी में महात्मा गांधी के चरखे को खारिज करते हुए मोहन भागवत यह कह रहे हैं चरखा के जरिए स्वराज नहीं मिलता है। दरअसल चरखा तो जिंदगी जीने के तौर तरीके और देश के साथ जुड़ने का तरीका हो सकता है लेकिन इसके जरिए स्वराज की कल्पना मत कीजिए।
तो क्या 100 बरस की अपनी यात्रा के बाद संघ अपनी राजनीतिक जमीन को खो चुका है और उसे दुबारा पाने का प्रयास कर रहा है या फिर अपने ही प्रचारक की सत्ता से नाराज है। इसके साथ ही प्रचारक की सत्ता से मदद भी मांग रहा है क्योंकि इस दौर में नेहरू-गांधी परिवार की राजनीति जिस रास्ते पर चल रही है उसमें अधिकतर कांग्रेस ही सत्ता में रही है। बीजेपी तो पहली बार सत्ता में है यानी स्वयंसेवक सत्ता में है यानी प्रचारक सत्ता में है और उसे चुनौती दे रहा है नेहरू-गांधी परिवार की विरासत और लेगेसी को संभालने वाला शख्स। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संघ और बीजेपी को वैचारिक तौर पर नग्न करने में लगा हुआ है। संघ और बीजेपी के सामने सवाल है कि उसका सामना कैसे किया जाए ? शायद इसीलिए संघ सरसंघचालक मोहन भागवत कोलकाता में राजनीति की चासनी में लिपटे हुए भाषण में राजनीतिक लकीर को और मोटा करते हुए खुले तौर पर देश में महात्मा गांधी की धारा और विचारधारा को खारिज करते हुए हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इसके नीचे कोई ठोस जमीन नहीं है सिवाय प्रचारक की सत्ता के। नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के दौर में प्रतिबंधित होने के बाद भी आरएसएस के सामने ऐसी परिस्थिति नहीं आई थी । किसी भी सरसंघचालक ने यह कहने और बताने की जरूरत नहीं समझी कि संघ को उसके राजनीतिक संगठन के चश्मे से ना देखा जाए। हेडगेवार, गोलवलकर, देवरस, रज्जू भैया, कुप्स सुदर्शन तक ने यह कहने की कोशिश नहीं की कि संविधान में चाहे परिवर्तन हो जाय, उसके भीतर हिन्दू राष्ट्र डाला जाय या ना डाला जाय इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम तो सिर्फ और सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के तौर पर खुद को मानते हैं, देखते हैं और देश को भी इसी तर्ज पर देखते हैं।
लेकिन आज के सरसंघचालक मोहन भागवत ऐसा कहने से चूक नहीं रहे हैं। वे आरएसएस की 100 बरस की यात्रा को सेलीब्रेट करने के लिए देशभर में घूम रहे हैं। इसी कड़ी में वे कोलकाता में शुध्द राजनीतिक भाषा में भाषण देते हुए कह रहे हैं कि अगर हिन्दू समाज एकजुट हो जाए तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन हो जायेगा। जबकि इसके पहले आरएसएस एक सामाजिक, सांस्कृतिक संगठन के तौर पर बिसात जरूर बिछाता रहा है । चाहे वह नेहरू का दौर रहा हो या इंदिरा गांधी का या फिर जब संघ जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के पीछे जाकर खड़ा हो गया था लेकिन ऐसा कहने की जुर्रत किसी भी सरसंघचालक ने नहीं की थी। आखिर मौजूदा वक्त में ऐसी कौन सी परिस्थिति आ गई कि संघ प्रमुख को यह कहना पड़ रहा है कि संघ को बीजेपी के ऐनक से मत देखिए जबकि सत्ता की लगाम तो उसका अपना ही प्रचारक थामे हुए है। तो क्या यह नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को सम्हाले राहुल गांधी जिस तरह से इस दौर में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरएसएस को लेकर सवाल उठा रहे हैं या फिर संघ की वैचारिक परिस्थितियां इस दौर में इतनी नाजुक हो चली है कि उसे अपने ही प्रचारक से दूर हटकर संघ को समझने और समझाने की कोशिश शहर दर शहर घूमकर सरसंघचालक को ही करनी पड़ रही है।
हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना मूलतः हिन्दू महासभा के नेता सावरकर की है। उस दौर में जब सावरकर अपना भाषण खत्म करते थे तो संघ के लोग वहां पहुंच कर जाती हुई भीड़ को रोककर उनके बीच हिन्दू समाज को लेकर अपने विचारों को रखते थे क्योंकि उस समय संघ के पास सावरकर जैसा एक भी ऐसा शख्स नहीं था जो सावरकर की तर्ज पर अपने विचार व्यक्त कर सके। फिर भी मोहन भागवत के पहले किसी भी सरसंघचालक ने हिन्दू समाज को एकजुट करने के पीछे हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना खुले तौर पर नहीं की थी। लेकिन मोहन भागवत संघ के 100 बरस पूरे होने पर संघ को जिस दिशा में ले जा रहे हैं उसमें उनके सामने पहली चुनौती तो खुद संघ से निकले प्रचारक और स्वयंसेवकों की वह टीम है जो इस समय देश को चला रही है और देश को चलाते वक्त प्रचारक जिन नीतियों के आसरे देश को चलाना चाहता है उससे संघ वैचारिक तौर पर दूर हो चला है। शायद इसीलिए संघ को कहना पड़ रहा है कि संगठन हमारा रहेगा, लेकिन बीजेपी का अध्यक्ष कौन होगा, संगठन कौन कैसे सम्हालेगा इसको लेकर भी टकराव है। क्योंकि इस दौर में बीजेपी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की उस बिसात का हिस्सा है जिसमें बहुत सारे स्वयंसेवक जो बीजेपी में शामिल हैं, मंत्री हैं, मंत्री रह चुके हैं वह फिट बैठ नहीं रहे हैं। लेकिन जब सरसंघचालक यह कहते हैं कि संघ को बीजेपी के चश्मे से नहीं संघ में शामिल होकर समझने की कोशिश कीजिए तो यह एक तरह से वह उस संकट से अपना बचाव कर रहे हैं जो मौजूदा वक्त में राहुल गांधी बीजेपी की राजनीतिक सत्ता को चुनौती दे रहे हैं और उसके पीछे वैचारिक और विचारधारा के तौर पर आरएसएस हर जगह पर नजर आता है तो क्या पहली बार आरएसएस खुद को बीजेपी से अलग कर रहा है।

संविधान को लेकर भी देश के भीतर व्यापक बहस शुरू हो गई है। उससे भी सरसंघचालक ने खुद को मोदी सरकार से अलग कर लिया है क्योंकि वह जान गये हैं कि देश के भीतर संविधान को लेकर राजनीतिक तौर पर विपक्ष जिस तरीके से लोगों के बीच में संवाद बना रहा है उसमें वह सिर्फ बाबा साहब अंबेडकर नहीं बल्कि देश के भीतर व्यापक वोट बैंक जो पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के जरिए राजनीति को अगर साधने लग जाए और एक तरफ बीजेपी और संघ खड़ी नजर आयेगी तो एक झटके में मोदी तो ध्वस्त होंगे ही संघ भी ध्वस्त हो जायेगा। शायद इसीलिए पहली बार मोहन भागवत ने संविधान को लेकर चल रहे मौजूदा विवाद से खुद को यह कहते हुए अलग - थलग कर लिया कि संविधान में हिन्दू राष्ट्र जोड़ने का फैसला संसद करती है या नहीं करती है और अगर करती भी है तो हमें इससे कुछ मतलब नहीं है। वह करें या ना करें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि हम खुद को यानी हमारा राष्ट्र एक हिन्दू राष्ट्र है। हम हिन्दू हैं। यही सच हम मानते हैं। जबकि बीजेपी इस बात का जिक्र नहीं करती है। वह तो काॅस्टिटयूशन के जरिए परिवर्तन कर सकती है क्योंकि काॅस्टिटयूशन की शपथ लेकर ही सरकार बनी हुई है यानी संविधान को लेकर विपक्ष और मोदी सरकार के बीच के टकराव में संघ कहीं अलग नजर आना चाहिए। यानी सरसंघचालक देश के विपक्ष को ही खारिज करते हुए कुछ इस तरह का मैसेज दे रहे हैं कि सत्ता भी हम ही हैं और विपक्ष भी हम ही हैं।
शतायु संघ को लेकर किसी ने कभी ऐसा सोचा ही नहीं कि संघ को इस पड़ाव पर आकर जनता के बीच जाकर अपनी विचारधारा को लेकर सफाई देनी पड़ेगी। इससे तो यही लग रहा है कि संघ राहुल गांधी के निशाने से बचने के लिए बीजेपी से दरकिनार हो रहा है। देश के भीतर तो किसी ने नहीं कहा कि संघ किसी पर हमला करने की योजना बना रहा है। तो फिर सरसंघचालक यह सफाई क्यों दे रहे हैं कि संघ का मकसद केवल हिन्दू समाज को संगठित करना है। यह किसी के खिलाफ नहीं है। हम तो योगा की तर्ज पर स्वयंसेवकों को फिट रखने का काम करते हैं। कोलकाता में भागवत एक तरफ बंगाल की राजनीतिक सत्ता को पलटने के लिए हिन्दूओं को एकजुट होने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिन्दूओं के लिए सरकार से कुछ करने की गुजारिश कर रहे हैं। क्या बीजेपी या कहें संघ प्रचारक मोदी की नीतियां बतौर सत्ता संघ की विचारधारा से टकराकर संघ के लिए ही मुश्किल पैदा कर रही है ? नेहरू और इंदिरा के दौर में संघ पर प्रतिबंध लगा, राजीव गांधी के दौर में मंड़ल - कमंड़ल की राजनीति का उफान खुलकर सामने आया, अटलबिहारी बाजपेई के दौर में गुजरात का राजनीतिक प्रयोग निकलकर आया जो मौजूदा वक्त में उत्तर प्रदेश में शिप्ट हो गया है।
राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर सरसंघचालक खुद अपनी बातों से फंसते चले जाते हैं। राहुल गांधी का कहना है कि संघ संविधान को नहीं मानता है, वह ताकत को सत्य से ज्यादा महत्वपूर्ण मानता है । सरसंघचालक मोहन भागवत कह रहे हैं कि संविधान में हिन्दू राष्ट्र जोड़ें या ना जोड़ें हमें कोई फर्क नहीं पड़ता है। हम तो हिन्दू राष्ट्र की भावना से ही खुद को हिन्दू मानते हैं और यही सच है। यानी सरसंघचालक मोहन भागवत संविधान से संघ को अलग कर रहे हैं। सरसंघचालक मोहन भागवत ताकत को ही सब कुछ मानते हैं सत्य को नहीं मानते हैं और ताकत का मतलब मौजूदा वक्त में मोदी सत्ता है। वह सत्ता अगर डिग जायेगी तो सब कुछ दिगंबर हो जायेगा। इसीलिए तो वह उसी ताकत का इस्तेमाल हिन्दू समुदाय की एकजुटता के आसरे बंगाल में सत्ता परिवर्तन भी देखना चाहते हैं। देश के भीतर संवैधानिक परिस्थितियों की जो सेकुलर लकीर है संघ उस लकीर से हटकर हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू परिकल्पना और हिन्दुत्व के आसरे देश के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय और जातियों को लेकर भी आरएसएस की सोच हटकर रही है।
सवाल उठता है कि क्या अपने ही अंतर्विरोध में फंसे हुए शतायु संघ के सामने पहली बार अपने ही अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है ? और उस अस्तित्व की लड़ाई में पहली बार वह अपने प्रचारक के प्रधानमंत्री बनने के जज्ब से हटकर वैचारिक और सियासी तौर पर खुद को अलग भी कर रहा है और मदद करने की गुहार भी लगा रहा है। अपने जीवन की 100 वीं सीढ़ी पर खड़े होकर संघ अपने स्वयंसेवकों को एकजुट करने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा वक्त में सारे धागे गुथम्मगुथ्था हैं क्योंकि स्वदेशी गायब है नारे को छोड़ कर, लोकल फार वोकल है लेकिन प्रोडक्शन खत्म हो चला है। असमानता चरम पर है और सत्ता कार्पोरेट के साथ खड़ी है। देश के भीतर आरएसएस के जो स्वयंसेवक सामान्य लोगों के साथ जीवन जीते थे आज के दौर में उससे हटकर सत्तानुकूल सुविधाभोगी हो चले हैं। राजनीतिक सत्ता की ताकत से जुड़ने का रास्ता आरएसएस से होकर ही निकलता है तो ऐसे में सत्ता के प्रतिबिंब के तौर पर संघ की मौजूदगी जो खुद को हेडगेवार और गोलवलकर के दौर की वैचारिक परिस्थितियों के साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है वह कैसे सही होगा ? वह तो खोखला ही होगा। तो क्या जो काम जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी नहीं कर पाये वह काम क्या राहुल गांधी कर देंगे ?

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार