
सरकार द्वारा लायी गई मुद्रा योजना के तहत खातों में डाली गई रकम जो सरकार ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 55 करोड़ लोगों के खाते में 33 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा डाले गये जिसमें देश का हर युवा शामिल है। यानी देश में एक भी युवा बेराजगार नहीं है लेकिन दूसरी तरफ सरकार का ही आंकड़ा बताता है कि तकरीबन साढ़े चार करोड़ युवा ऐसे हैं जिन्होंने अलग - अलग जगहों पर अपना नामांकन बेरोजगारी की वजह से कराया हुआ है यानी देश में इतने रजिस्टर्ड बेराजगार हैं। और अनजरजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या भी सवा दो करोड़ से अधिक है और नौकरी के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां पाने के लिए हाथों में डिग्री लिए घूम रहे हैं। देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और उत्पादन प्रणाली सबसे न्यूनतम और निगेटिव में है। इसमें भी 2014 के पहले वाली स्थिति में लगभग 80 लाख की कमी बरस दर बरस होती चली गई है। देश के भीतर एमएसएमई, छोटी इंडस्ट्रियां जो देश की इकोनॉमी में बड़ा योगदान दे रही थीं उसमें लगभग 19 फीसदी की कमी आ गई है। रोजगार के हिसाब से वह 37 परसेंट नीचे आ गया है।इस देश के भीतर प्रोफेशनली तौर पर पहचाने वाले शहरों में मिलने वाला रोजगार कम होते - होते 42 फीसदी पर आकर खड़ा हो गया है। सूरत, हैदराबाद, लखनऊ, बैंगलुरू, चैन्नई, चंडीगढ़, मुंबई, दिल्ली सहित ऐसे 12 शहर हैं। देश के भीतर हर चुनावी प्रक्रिया में जो पैसा बांटा जाता है इसके बावजूद भी देश की डगमगाती इकोनॉमी का असर यह है कि तमाम राज्यों के ऊपर लदे हुए कर्ज का एवरेज निकाला जाय तो हर राज्य तकरीबन 3.5 से 5 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में डूबा हुआ है। उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों की हालत यह कि अगर वह बीजेपी शासित राज्य है तो उसके मुख्यमंत्री को उफ तक करने की इजाजत नहीं है और गैर बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सामने आहें भरते हुए कर्ज दर कर्ज लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। कार्पोरेट किसी भी परिर्वतन की दिशा में सोच भी नहीं सकता अगर उसने सोचने के लिए जैसे ही किसी राजनीतिक दल को फंडिंग की तो तत्काल ही उस पर सीबीआई, आईडी, आईटी का धावा हो जायेगा और उससे की गई फंडिंग का कम से कम 40 फीसदी तो बसूली ही लिया जायेगा । देश के भीतर काम करने वाले बैंकस्, अलग - अलग सेक्टर्स पर पहले डिसइन्वेस्टमेंट के नाम पर पंजा कसा गया और उसके बाद मोनोटाइजेशन और प्राइवेटाइजेशन के नाम पर गला ही दबा दिया गया। जिसका सीधा असर बीते 11 साल में लगभग 3 करोड़ लोगों पर पड़ा है। जिनका या तो रोजगार खत्म हो गया है या फिर उनको जबरिया रिटायर्मेंट (बीआरएस) लेना पड़ा है। देश की राजनीति करने वाले जो चुनाव के वक्त अपने कार्यकर्ताओं को पैसे बांटा करते थे जो आने वाले दिनों में उन्हें कुछ राहत देता था, उसे भी गुजराती लाॅबी ने हड़प लिया है । हर चुनाव में गुजराती लाॅबी की मौजूदगी उस पूरे पैसे पर कब्जा कर लेती है। बीजेपी और संघ से जुड़े हुए लोगों के पास न तो कोई विचारधारा बची है न ही कोई ऐजेंडा है। अब तो उनके पास एक ही रास्ता है जिसका जिक्र मोहन भागवत ने पोर्ट ब्लेयर में किया जिसको राहुल गांधी ने भी वोट चोर गद्दी छोड़ नारे वाली रैली में यह कह कर दिया कि बकौल मोहन भागवत "ताकत ही सब कुछ है"। यानी राजनीतिक तौर पर आपको चुनावी जीत के लिए मशीन बनना होगा। ये सवाल ऐसे हैं जिससे लोगों के भीतर गुस्सा है, आक्रोश है लेकिन कोई भी राजनीतिक परिवर्तन नहीं ला सकते। क्योंकि देश में मौजूद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के राजनीतिक तौर तरीकों ने देश की उस पूरी पारंपरिक राजनीति को ही खत्म कर दिया है जिस राजनीति के आसरे चुनाव होते थे, सत्ता परिवर्तन होता था। जब पूरी मशीनरी को ही बदल दिया गया है तो फिर चाहे वह राहुल गांधी हों, कांग्रेस हो या फिर पूरा विपक्ष ही क्यों ना हो सत्ता परिवर्तन नहीं कर सकते हैं।

भारत की राजनीति ऐसी कभी नहीं थी। देश के भीतर बनने वाले नियम कायदे, संस्थानों के जरिए चलने वाली सत्ता, संसद और सुप्रीम कोर्ट के जरिए निर्धारित होने वाले न्याय के मापदंड, लोकतंत्र को लेकर चुनाव आयोग की भूमिका और प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री जिस मुहाने पर आकर खड़े हो गए हैं तो क्या वाकई देश को वैचारिक, राजनीतिक, सियासी, जनता, राजनीति के तौर तरीकों को दो हिस्सों में बांट दिया गया है। ऐसी परिस्थिति तो इंदिरा गांधी के दौर में लगाई गई इमर्जेंसी के वक्त, मंडल - कमंडल की राजनीति के दौर में, दिल्ली में हुए सिख्ख दंगे, गुजरात में हुए दंगे के दौर में भी पैदा नहीं हुई थी। तब के दौर में देश में सुप्रीम कोर्ट था, चुनाव आयोग था, तमाम संस्थान थे, पार्लियामेंट में ऐसा प्रधानमंत्री भी था जो गुजरात में हुए नरसंहार को लेकर राजधर्म की बात करने से नहीं चूका था। इमर्जेंसी लगाने वाली प्रधानमंत्री ने भी इसका एहसास किया था कि जिस रास्ते वो गई थी वह रास्ता सही नहीं था। लेकिन मौजूदा वक्त में ऐसा कुछ भी नहीं है। यानी सारे के सारे शवासन कर रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक सत्ता सिर्फ सत्ता के आसरे चल रही है और सत्ता का मतलब है वह ताकत जिसके जरिए देश के संविधान को छिन्न - भिन्न कर दिया गया है। छिन्न - भिन्न का मतलब है कि दरअसल अब कोई विचारधारा बची ही नहीं है और जो विचारधारा है उसका मतलब सिर्फ और सिर्फ सत्ता है।
पहली बार देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, सरसंघचालक, इलेक्शन कमीशन को चलाने वाले चीफ इलेक्शन कमिश्नर के साथ दो और सहयोगी का नाम लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान से विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने वोट चोर गद्दी छोड़ नारे वाली रैली को संबोधित करते हुए ऐलान किया कि जो कुछ भी हो रहा है वह सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि वह सत्ता में हैं और जिस दिन सत्ता गई उस दिन देश की जनता इन्हें बख्शेगी नहीं। इतना ही नहीं इन्हें खदेड़ कर बाहर करने के बाद जनता जिस सत्ता को स्थापित करेगी वह स्थापित सत्ता भी नियम कायदे बदलकर इन्हें दंडित करने का काम करेगी। इन बातों को कहना आसान नहीं है यह समझते हुए कि मौजूदा वक्त में मोदी सरकार को वोट मिले हैं लेकिन सवाल यह है कि कल तक इस बात का जिक्र होता था कि चलिए इन्हें वोट मिले हैं इसलिए ये चुनाव जीत कर आये हैं लेकिन इस वक्त तो बकायदा जिस तरह से देश के अलग - अलग प्रांतों के लोगों के हस्ताक्षर युक्त पत्र जो हजारों बोरियों में भरकर आये हैं वह सवाल उठा रहे हैं कि अब देश में वोट चोरी हो रही है, देश का चुनाव आयोग सत्ता के साथ मिला हुआ है। देश की न्यायिक प्रक्रिया को खत्म कर दिया गया है खासतौर पर चुनाव को लेकर। देशभर से आये हस्ताक्षर युक्त पत्रों को आज नहीं तो कल सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को सौंपा जायेगा । लाखों की तादाद में इकट्ठा हुए लोगों ने जिस तरह से वोट चोरी की आवाज उठाई तो क्या वाकई रामलीला मैदान उसका प्रतीक बन गया है। क्योंकि जिस तरह से देश के प्रधानमंत्री को, गृहमंत्री को खुले तौर पर यह कहते हुए चेतावनी दी गई कि "वो जानते हैं कि हमारी वोट चोरी पकड़ी गई है" । पार्लियामेंट के भीतर बोलते हुए अमित शाह के हाथ इसलिए कांप रहे थे कि वे सिर्फ तब तक बहादुर हैं जब तक हाथ में सत्ता है जैसे ही सत्ता हाथ से छूटेगी सारी बहादुरी हवा हवाई हो जायेगी।

वोट चोरी रैली में दिये गये भाषण ने राममनोहर लोहिया जयप्रकाश नारायण, अटलबिहारी बाजपेई के भाषणों की याद तरोताजा कर दी। जब राममनोहर लोहिया ने नेहरू के खिलाफ, जयप्रकाश नारायण ने श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ, अटलबिहारी बाजपेई ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को लेकर दिया था। इसी कड़ी में आरएसएस ने क्रिया की प्रतिक्रिया के तौर पर गुजरात में हुए नरसंहार पर दिया था। आज उसी संघ का सरसंघचालक मोहन भागवत कह रहा है दरअसल "देश में सत्य कोई ताकत नहीं है ताकत तो सत्ता है और ताकत ही भारत का प्रतीक है" यानी मोहन भागवत कहना चाह रहा है कि हरहाल में सत्ता के साथ खड़े होकर सत्ता को साथ लेकर चलना है और यही काम स्वयंसेवक और संघ प्रचारक रहे नरेन्द्र मोदी, अमित शाह बतौर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री करते हुए मौजूदा राजनीतिक सत्ता की पहचान बना रहे हैं। क्या वाकई महात्मा गांधी और संघ परिवार के बीच नाथूराम गोडसे इस तर्ज पर आकर खड़ा हो गया है जहां विचारधारा उस दौर में जब गांधी की हत्या की गई थी तो वह भी सत्ता के लिए थी क्योंकि राहुल गांधी ने जिस सवाल को उठाया है उस सवाल के मूल में यही सच छुपा हुआ है। चाहे वह प्रचारक हो या स्वयंसेवक और संघ जब अपनी भूमिका भी शक्ति के तौर पर देखता है और सच दूर हो जाता है तो इसके मतलब - मायने एक ही हैं कि किसी भी हालत में सत्ता चाहिए। तो क्या देश के भीतर हो रही हर प्रक्रिया सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने के लिए हो रही थी यानी नाथूराम गोडसे से लेकर मंडल - कमंडल, गुजरात के दंगे और मौजूदा वक्त में सत्ता की डोर प्रचारक के हाथ में है तो क्या इसी तरीके की सियासत ही मौजूदा वक्त की वह हकीकत है जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने स्वयंसेवकों को पढ़ाता है। खुद सरसंघचालक मोहन भागवत ने पोर्ट ब्लेयर में कहा है कि "विश्व सत्य को नहीं शक्ति को देखता है जिसके पास शक्ति है उसे माना जाता है" । भागवत की कही बात से ही राहुल ने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि "ये मोहन भागवत की सोच है, आरएसएस की विचारधारा है जहां सत्य का कोई मतलब नहीं है, सत्ता जरूरी है। हमारी, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म, दुनिया के हर धर्म की विचारधारा कहती है कि सत्य सबसे जरूरी है" ।
जाहिर तौर पर रैली तो वोट चोरी को लेकर थी, देश के भीतर चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर थी। रैली इस दौर में सत्ता के उस व्यापक कटघरे को लेकर थी जिसके दायरे में देश के तमाम संस्थान हड़पे जा चुके हैं या उन पर सत्ता काबिज हो गई है। 2014 के बाद जिस तरह से गवर्नेस के तौर तरीके बदले गए हैं और अगर सत्ता बदलती है तो उन तौर तरीकों को नये सिरे मथा जायेगा राहुल गांधी उस लकीर को खींचने का ऐलान कर रहा था। सामान्य तौर पर विपक्ष किसी नौकरशाह का नाम लेकर यह कहता नहीं है कि आपने देश को बरबाद कर दिया है लेकिन राहुल गांधी ने बकायदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता और उसके दोनों सहयोगियों का नाम लेते हुए कहा कि मोदी सरकार ने जो इम्यूनिटी दी है, जिस कानून को ढाल बनाकर सरकार चुनाव जीतने का मंत्र पा चुकी है उसे बदल दिया जायेगा और किसी को बख्शा नहीं जायेगा। क्या विपक्ष जनता से उसके भीतर के गुस्से, आक्रोश के जरिए संवाद बना रहा है या फिर मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीति खत्म होने की मुनादी कर रहा है। क्योंकि मौजूदा राजनीतिक सत्ता ने समूची चुनाव प्रक्रिया को ही अपनी पंजे में दबोच लिया है तो फिर चुनाव के जरिए तो परिवर्तन होने से रहा। तो क्या विपक्ष जनता के भीतर व्याप्त गुस्से और आक्रोश को ढाल बनाकर या जनता के साथ खड़े होकर राजनीति को साधने का मंत्र बना रहा है। क्योंकि इसी मंत्र के जरिए 1975 के बाद 1977 में जयप्रकाश नारायण ने व्यापक परिवर्तन की दिशा में सम्पूर्ण क्रांति का नारा लगाते हुए आंदोलन किया था। शायद ऐसा ही कुछ करने के लिए ही राहुल गांधी ने उन तमाम नौकरशाहों का नाम लेते हुए, जो सियासत के ईशारे पर या कहें सियासत के हाथों बंधक हैं, कहा कि "इलेक्शन कमिश्नर बीजेपी सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है। इनको जितनी भी इम्युनिटी देनी है दे दो। आप मत भूलिए आप हिन्दुस्तान के इलेक्शन कमिश्नर हो आप नरेन्द्र मोदी के इलेक्शन कमिश्नर नहीं हो। आपको साफ कह रहे हैं कि सरकार पर आने के बाद आपको सुरक्षित करने वाले कानूनों को बदल दिया जायेगा और आपके खिलाफ एक्शन लिया जायेगा"। यह मैसेज इतना भर नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या मौजूदा राजनीतिक सत्ता को इस बात का एहसास है कि बीते 11 बरसों से वह जिस रास्ते चल रही है वह रास्ता असंवैधानिक है, गैरकानूनी है। वह रास्ता सिर्फ और सिर्फ कानूनी तौर पर दिखलाते हुए सत्ता पाने के बाद देश के कानून को ही अपने हाथों में दबोचने का है।

ऐसी परिस्थिति तो इससे पहले देश के भीतर कभी नहीं रही है। जनता के सामने चुनौतियां नहीं मुश्किल हालात हैं जो अभी तक देश में आजादी के बाद संसदीय राजनीति के आसरे चलने के थे। उसके तौर तरीके बदल गये हैं तो सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के सामने है क्योंकि वे जिस रास्ते चल रहे हैं उस रास्ते को उन्हें और एग्रेसिवली देश में लाना होगा अन्यथा सत्ता खिसक गई तो विपक्ष का नेता कह रहा है कि छोड़ेंगे नहीं। चुनाव आयुक्तों को कह रहा है छोड़ेंगे नहीं। यह चेतावनी ईडी, सीबीआई, आईटी के मुखियाओं को भी दी जा चुकी है। यानी यह मैसेज टकराव का है। ये मैसेज व्यापक परिवर्तन की दिशा में बढ़ते हुए उन कदमों का है जो जान गये हैं कि दरअसल चुनाव के आसरे कुछ नहीं होगा। सवाल है कि क्या देश की राजनीतिक परिस्थितियां खुद को जनता या नागरिक में तब्दील कर पार्लियामेंट के भीतर और पार्लियामेंट के बाहर निकल कर उस रास्ते पर चलने को तैयार हैं जिस रास्ते की सोच रामलीला मैदान से राहुल गांधी देना चाह रहा है या यह सिर्फ कहने की बात है। लेकिन कहते हैं कि आहट की शुरुआत में बहुत छोटी होती है। इसीलिए शायद असल टेस्ट तो पश्चिम बंगाल में है जिसमें अगर ममता हारी तो फिर क्या स्टालिन और क्या केरला। कौन सा राज्य, कौन सी राजनीति, कौन सा राजनीतिक दल कोई नहीं बचेगा। बिहार में तो नितीश कुमार के रूप में एक ढाल थी लेकिन बंगाल में कोई ढाल नहीं है। सीधी और स्पष्ट लड़ाई है। उस लड़ाई में चुनाव आयोग कितना बड़ा प्लेयर साबित होगा ? वह भारत की आगामी राजनीति को तय भी करेगा और रामलीला मैदान के भीतर से निकली हुई उन आवाजों को रास्ता भी दिखायेगा। या फिर दिल्ली का रामलीला मैदान कहीं पूरे देश का मैदान तो नहीं बन जायेगा ? ऐसी परिस्थिति भी देश में अभी तक तो नहीं आई है। आजादी के बाद भारत की राजनीति पहली बार उस चौखट पर आकर खड़ी हो गई है जिस चौखट के दरवाजे संविधान और संस्थान - संसदीय राजनीति और चुनाव के लिए बंद हो चुके हैं।

अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
स्वतंत्र पत्रकार