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बिहार के प्रथम मुख्य मंत्री एवं आधुनिक बिहार के निर्माता ' बिहार केसरी ‘डा0 श्री कृष्ण सिंह’ की आज भी जरूरत है।
मैंने तो कभी डाक्टर श्री कृष्ण सिंह जी को न देखा और न मिला । मगर अपने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, ताम्रपत्र धारी पिताश्री विश्वनाथ नाथ प्रसाद श्रीवास्तव के मुखार विंद से जो कुछ उनके बारे में सुना या पढा वही हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया। आज उन्हें यादकर बिहार ही नही अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र के सभी बर्ग-समुदाय के बुद्धिजीवियों एवं उनसे प्रभावित जनों का सिर गर्व से गौरवान्वित Shri Krishna Sinha - Wikipediaऔर उंचा हो जाता है। क्योंकि वे स्वार्थ की राजनीति कभी नही की । जाति-धर्म से उपर उठकर राष्ट्र की सेवा किया जिस के कारण उन्हे महामानव की संज्ञासे विभूषित किया गया ,तो यह कोई अतिशयोक्ति नही।
'उंच-नीच का भेद न माने,
वही श्रेष्ठ जन ज्ञानी है ।
दया - धर्म जिसमें हो वही
सबसे पूज्य प्राणी है।।'
क्योंकि यह व्यक्ति कभी भी अपने निजी स्वार्थ के लिए अपने सिद्धान्तों से समझौता नही किया । अपने कर्तव्यों और वसुलो के पक्के हिमायती श्री कृष्ण बाबू अपने विकास के कार्यों और विचारों से लोगों के 'नाक के बाल बने थे '। लोगों पर उनकाऔर उन पर लोंगो का इतना विश्वास बना था कि चुनावों में अपनी पाटी के नेताओं के साथ अपने लिए कभी भी वे वोट मांगने या चुनाव प्रचार करने नहीं जाना पड्ता था। ऐसा कहा जाता है कि उन्हे विश्वास था कि ' वे जनता का काम करते हैं तो लोग उसकी मजदूरी बोट के रूप मेें जरूर देंगे।'
आज याद आ रहे हैं इनके राजनीतिक मित्र और वैशाली, गोरौल के लाल,स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी बिहार विधान सभा के प्रथम स्पीकर स्मृति शेष विन्देश्वरी प्रसाद वर्मा, जो लगातार 16 वर्षों तक बिहार विधान सभा के स्पीकर रहे। इन दोनो का बिहार के विकास में अतुलनीय,अद्वितीय और अविस्मरणीय योगदान रहा । मगर आजादी के इतने दिनो बाद भी ऐसे विभूतियोंको याद करने के लिए समय नही? वैशाली में इन दोनो की प्रतिमा लगाने का असफल, प्रयास जारी है ।
क्या प्रथम मुख्य मंत्री और प्रथम स्पीकर होने के नाते वह सम्मान या चर्चा नही हुआ, जो होना चाहिए था। बिहार के विकास में इन लोगों ने अपनी महती भूमिका निभाते हुए, जाति-धर्म से ऊपर उठ कर बिहार की गौरव- गरिमा प्रदान करने, ऊपर उठाने में क्या कोई कसर छोड़ा ? नही तो फिर जिसने देश की आजादी के लिए इतनी वही लडाई लडी, अपने परिवार, किसी जात,समाज के लिए तो नही लडा ? फिर तो दुख इसी बात से होती है कि ऐसे स्वतंत्रता-संग्राम के सेनानियों, युगपुरूषों को जो सागर - स्वरूप के स्वभाव का स्वामी रहा है उनकी जयन्ती उसकी पुण्यतिथि मनाने के लिए जात,समाज उसके परिवार के लोंगो को सामने आने की जरूरत क्यों पड़ती है ?
वोट की राजनीति के कू प्रभाव के कारण इन राष्ट्रीय छवि वाले महा मानवों को जो स्वयं मेें सागर था उन्हे जाति-धर्म और समाज के लोग इन्हे लोटा मेें भरने का कूप्रयास कर इनकी राष्ट्रीय छवि को धूमिल करने का षड़यंत्र कर उनके विराट और विशाल रूप को बौना बनाने का दुस -प्रयास क्यों करते है? क्या ये लोग जात-समाज -धर्म के लिए अपनी जवानी की कुर्वानी दी थी? या देश और राष्ट्र के नव निर्माण के लिए? देश की आजादी के लिए लडने बाले को सभी का आदर मिलना चाहिए, सभी की श्रद्धांजलि, पुष्पांजलि मिलनी चाहिए। उनका आदर , सम्मन और सत्कार करने का मतलब आप भारत माता को प्यार कर रहे हैं, आदर दे रहे है, सत्कार कर रहे है।
आज हम भारतीय निर्वल आत्माओं के पास हैं ही क्या जो दें, बस आपके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि आपके सपनो का बिहार बनाए । इस भारत रूपी उपवन मेें सभी पुष्पों को मुस्काने का अधिकार है , सबको खिलने का मौका मिलना चाहिए। अगर उनके बताए रास्ते पर हम चलें और अपने प्रति निधियों को भी चलने को प्रेरित करें तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और पुष्पांजलि होगी। हम अपने शब्द सुमनो से बने माला चढाकर अपनी विनम्र श्रद्धा निवेदित करता हूं
शत-शत नमन,कोटि- कोटि प्रणाम।
जय बिहार, जय भारत देश महान ।
स्वतंत्रता सेनानियों आओ,तुम बार-बार इस धरती पर आओ और हमारा नेतृत्व कर नया बिहार और नया भारत ही नही अपितु अब अखण्ड आर्यावर्त बनाओ तो फिर से स्वागत और अभिवंदन है। " हार जो इस देश का तूने किया उपकार । कौन कर सकता है तेरे मूल्य को निराधार ?"

(रवीन्द्र कुमार रतन, सेनानी-सदन)
हाजीपुर, वैशाली